वेद प्रकाश की बेहतरीन कविता – “कह दो उनसे”

Ved Prakash Vedant

Ved Prakash Vedant Poem ( Ved Prakash Vedant Ki Kavita ) – इस पोस्ट में युवा लेखक वेद प्रकाश दूबे (वेदान्त) की बेहतरीन कविता “कह दो उनसे” प्रस्तुत किया गया हैं. यह कविता मानव जीवन के यथार्थ भाव को प्रस्तुत करता हैं. इस कविता को पूरा जरूर पढ़े और शेयर करें.

वेद प्रकाश की कविता | Ved Prakash Vedant Ki Kavita

कह दो उनसे जो आया हैं वो जायेगा
फिर-फिर जीवन पायेगा.

तेरे तन के ढाँचे पर
अमरत्व प्राप्त बैठी इक चिड़िया डाल हिलाते उड़ जायेगी
छोड़ सुनहरे आमों की बगिया,

फिर जो लौट के आएगी
विलग रूप ढंग पाएगी
अपनों को न पहचानेगी
होश गवां के आएगी.

नर में नर्क, नर्क में नर हैं
तर में तर्क, तर्क में तर हैं
सुख में स्वर्ग, स्वर्ग में सुख हैं
ज्ञानहीन प्राणी में दुःख हैं.

सुख-दुःख के दो पहलू से
जिसने खुशियों को छीन लिया
सागर की गहराई में जाकर
उसने मोती बीन लिया.

कर ले कर्म नेक इस जग में
भर ले तिजोरी ईश्वर के घर में
मोह-माया बस रख इतना
चाहे कोई संत जितना.

न लेकर आया था कुछ
न ही कुछ लेकर जाएगा
कल को तेरा अपना ही
तझको मिटटी में दफ़नाएगा.

खड़ी हवेली रूपये-पैसे
सौ एकड़ ज़मीन रह जायेगी
बस तेरी लम्बाई बराबर
जमीं तेरे हिस्से आयेगी.

फिर जो लौट के आएगा
बिलग रूप ढंग पाएगा
अपनों को न पहचानेगा
होश गवां के आएगा

क्यूँ न करूँ श्रृंगार पिये?

क्यूँ न करूँ श्रृंगार पिये?
भले ही तुम
जग-सौतन से प्यार किये!

तुम तन से सम्मुख न सही
मेरी साँसों, धड़कन,दिलों-दिमाग़
में समाये हुए हो
वो भी जिन्दे से भी जिंदा,
अब भी मैं बिस्तर पर
तुमसे रात में लड़ती हूँ
तुम अपने सुकोमल हाथों से
मेरे बिखरे केशों को सहेजते हो,
मैं नाक से ग़ुस्सा उड़ाती हूँ
इक प्यारा चुम्बन कर जाती हूँ
स्वर्ग लोक की परियों जितना
आनंद परमसुख पाती हूँ।

पूरे सोलह श्रृंगार करके
शैया पर
कामदेव से लड़ती-भिड़ती हूँ
आख़िर कौन?
तन-मन की प्यास बुझाता है,
तुम ही तो आते हो
रात के अंधेरे में सुनसान
वीराने जंगल से होकर,
किसी को कोई भनक नहीं
बिना किसी आहट के
मुझे नींद से जगाते हो
हँसते हो हँसाते हो
अठखेलियां करके
प्रेमालिंगन की
चरमानुभूति कराते हो।
आते हो,
संसार की सबसे अमूल्य ख़ुशी
प्रदान करते हो
और भोर होते होते
पुनः सौतन(मृत्यु) के देश
चले जाते हो।

मैं तुम्हारी मज़बूरी
समझ सकती हूँ
मुझे उस सौतन से
कोई द्वेष नहीं
क्योंकि वह मेरी ही नहीं
अपितु संसार की सौतन है.
मैं ख़ुश हूँ कि मेरी सौतन
मेरे प्रियतम को
फाँसकर तो नही रखी
उन्हें मेरे पास आने की
इज़ाजत तो देती है,
दिन-दोपहर में न सही
रात के सन्नाटे में ही सही.

क्योंकि वह भी इससे अवगत है
की मैं चंदा तो तुम सूर्य थे
तुम्हारे अस्तित्व से
मेरा जीवन, मेरा यौवन
प्रकाशमान था,है और रहेगा
धुँधला ही सही ।

दुनियाँ को नही दिखता
पर तुम मेरे शरीर के
रोम-रोम में समाये हो
हम एक तन दो जान हैं.
बस मैं यूँ ही
रात के अँधेरे में
दरवाज़ा खुला छोड़े रखूं
तुम चोरी छिपे आते रहो
प्रीत बढ़ाते रहो.
मैं तन-मन
समर्पित करती रहूँ।

दुनियाँ वाले कुछ भी कहें
तुम मेरे लिए,
जिंदा थे
जिंदा हो
जिंदा रहोगे.
जब तक साँसों की
अंतिम कड़ी टूट न जाये
तब तक तुम
मेरे प्रियतम
और मैं तुम्हारी
सोलह श्रृंगारी प्रेयसी।।

*जब तक चले
साँसों की तार प्रिये
तब तक करूँ
सोलह श्रृंगार प्रिये.
दुनियाँ वाले,
अज्ञान के अंधेरे में
कुछ भी कहें
पर मानूँ न तुम्हें
अपनी हार प्रिये
करती रहूँ ,
सोलह श्रृंगार प्रिये।

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