यशु जान की बेहतरीन शायरी | Yashu Jaan Ki Shayari

यशु जान की शायरी – पंजाब के मशहूर शायर यशु जान एक ऐसे शायर हैं जो अपनी तलवार जैसी शायरी में आग़ उग़लते हैं
उनकी शायरी सत्ता की धज्जियाँ उड़ा देती है | आपको बता दें कि यशु जान सिर्फ़ हिंदी में ही नहीं बल्कि
पंजाबी , उर्दू और अंग्रेज़ी में भी कविताएँ , शायरी , ग़ज़ल और लेख़ लिख़ते हैं उनकी पंजाबी की
कविताओं के लोग़ पाक़िस्तान में भी दीवाने हैं | उनके नाम अभी तक 60 हिंदी की ग़ज़लें , 50 हिंदी , उर्दू
के शेऱ , 200 पंजाबी कविताएँ 50 पंजाबी ग़ज़लें, 25 हिंदी बाल कविताएँ हैं | महज़ 26 साल की उम्र का ये
शायर अपनी ग़ज़लों में मुर्दे में जान फ़ूँकने वाली शायरी का इस्तेमाल करता है आपको बता दें कि यशु
जान मशहूर शायर डॉ : राहत इन्दौरी को अपना उस्ताद मानते हैं | यशु जान गाने का भी शौक़ रख़ते हैं
उनको ऐसे विषयों पर ख़ोज करना भी बहुत पसंद है जिनको लोग़ नहीं मानते जैसे समय यात्रा , दूसरी
दुनियां का अस्तित्व है या नहीं इत्यादि |

यशु जान के दस सदाबहार शेऱ

मैंने लोग पानी पे चलते देखे हैं ,
पेड़ के आंसू निकलते देखे हैं ,
ईरान की हसीनाओं का हुस्न देख ,
दिल ही नहीं पत्थर भी पिघलते देखे हैं ,
मैंने नामुमकिन तब्दीलियों को देखा है ,
रेगिस्ताऩ समंदर में बदलते देखे हैं


आसमां के मुखड़े पर लटकी मौत की लट सी लग रही है ,
मैं कितने दिनों से देख रहा हूँ दुनियां मरघट सी लग रही है,
देख रहा हूँ पहाड़ ख़ूबसूरत दिख रहे हैं किसी हसीना की तरह ,
ना जाने क्यों मुझे ये उनके घर की छत सी लग रही है ,
लाशों के ढेर लग रहे हैं जान , जान पे जान जा रही है ,
ये कोई बीमारी नहीं उसका ख़ेल है उसकी हठ सी लग रही है


छलांग लगाओ दरिया में क्या पता किनारा मिल जाये ,
आप भी हमारी ग़ली में आईये हो सकता कोई सहारा मिल जाये


कुछ दिनों से सोच रहा था कोई अच्छा काम करूँ ,
सोचा आज आपसे मिलता ही चलूँ


उनकी ज़ुबां पे मेरा नाम इस कदर रहता है ,
जैसे झूठ बन गया हूँ मैं उनके लिए ,
उससे मिलने की यूँ ज़िद न कर ,
कभी वक़्त ने वक़्त निकाला है किसी के लिए


आप इश्क़ में लुट जाने की परवाह करते हैं ,
दीवाने तो इसमें मर जाने की इल्तिज़ा करते हैं ,
आपकी तबियत तो अच्छी भली है ,
वरना लोग तो मरने की दुआ करते हैं.


सुबह उठते ही हमारी आँखें नम होती हैं ,
ऐसा लगता है जैसे ख़्वाहिशें ख़त्म होती हैं ,
बड़ा दर्द होता जब ऐसे ख़्वाब देखती हैं ,
जिसके पूरा होने की उम्मीदें बहुत कम होती हैं


शराब की एक नदी बनाओ ,
क़ाग़ज़ की कश्तियाँ चलाओ ,
पता जब चले ख़ेल ख़त्म है ,
आग लगाओ और मर जाओ


वो जब अपने ख़ून से ख़त लिख़ते हैं ,
मेरी नाराज़गी को भी मोहब्बत लिखते हैं ,
मैं गुस्से में ख़त को जला देता हूँ ,
इस गुस्ताख़ी को वो ख़त में इबादत लिख़ते हैं


अभी तुमने होश संभाली नहीं है ,
पटाख़े मत बजाओ आज दीवाली नहीं है,
सारा जहां शहद में ज़हर दे रहा है ,
साहब दुनियां अभी ख़तरों से ख़ाली नहीं है


यशु जान,
जालंधरी शायर , दार्शनिक , लेख़क
9877874659

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