binary options review forum parabolic sar os maiores traders de opções binária strategy 60 seconds binary options

महात्मा गांधी पर कविता | Poem on Mahatma Gandhi in Hindi

Poem on Mahatma Gandhi in Hindi – प्रतिवर्ष 2 अक्टूबर को गांधी जयंती मनाते हैं, इस पोस्ट में महात्मा गांधी पर बेहतरीन कवितायें दी गयी हैं. इन्हें जरूर पढ़े.

महात्मा गांधी पर कविता | Poem on Mahatma Gandhi in Hindi

रघुपति राघव राजा राम | Gandhi Jayanti Par Hindi Kavita

रघुपति राघव राजा राम हिन्दू धर्म का एक प्रशिद्ध गीत है. जिस को राम धुन के नाम से भी जाना जाता है. यह गीत श्री नामा रामयानाम से लिया गया था जिस को लक्ष्मनाचार्य जी ने लिखा था.

मूल गीत | Original lyrics

रघुपति राघव राजाराम
पतित पावन सीताराम
सुंदर विग्रह मेघश्याम
गंगा तुलसी शालग्राम
भद्रगिरीश्वर सीताराम
भगत-जनप्रिय सीताराम
जानकीरमणा सीताराम
जयजय राघव सीताराम

जिस गीत को गाँधी ने नमक का कानून तोड़ने के दौरान अपने साथियों के साथ गाया था उस गीत को विष्णु दिगंबर पलुस्कर ( Vishnu Digambar Paluskar ) जी ने लिखा था, जिसके शब्द थे :

रघुपति राघव राजाराम,
पतित पावन सीताराम

सीताराम सीताराम,
भज प्यारे तू सीताराम

ईश्वर अल्लाह तेरो नाम,
सब को सन्मति दे भगवान

नोटPoem on Mahatma Gandhi in Hindi विकिपीडिया और एक अन्य वेब रिसोर्स से लिए गये हैं.


तुम्हें नमन | Mahatma Gandhi Par Kavita in Hindi

चल पड़े जिधर दो डग, मग में
चल पड़े कोटि पग उसी ओर ;
गड़ गई जिधर भी एक दृष्टि
गड़ गए कोटि दृग उसी ओर,

जिसके शिर पर निज हाथ धरा
उसके शिर- रक्षक कोटि हाथ
जिस पर निज मस्तक झुका दिया
झुक गए उसी पर कोटि माथ ;

हे कोटि चरण, हे कोटि बाहु
हे कोटि रूप, हे कोटि नाम !
तुम एक मूर्ति, प्रतिमूर्ति कोटि
हे कोटि मूर्ति, तुमको प्रणाम !

युग बढ़ा तुम्हारी हँसी देख
युग हटा तुम्हारी भृकुटि देख,
तुम अचल मेखला बन भू की
खीचते काल पर अमिट रेख ;

तुम बोल उठे युग बोल उठा
तुम मौन रहे, जग मौन बना,
कुछ कर्म तुम्हारे संचित कर
युगकर्म जगा, युगधर्म तना ;

युग-परिवर्तक, युग-संस्थापक
युग संचालक, हे युगाधार !
युग-निर्माता, युग-मूर्ति तुम्हें
युग युग तक युग का नमस्कार !

दृढ़ चरण, सुदृढ़ करसंपुट से
तुम काल-चक्र की चाल रोक,
नित महाकाल की छाती पर
लिखते करुणा के पुण्य श्लोक !

हे युग-द्रष्टा, हे युग सृष्टा,
पढ़ते कैसा यह मोक्ष मन्त्र ?
इस राजतंत्र के खण्डहर में
उगता अभिनव भारत स्वतन्त्र !

सोहनलाल द्विवेदी


जय हो | Gandhi Poem in Hindi

जय हो जय हो हे गांधी तेरी जय हो
तुमने हमें सिखाया, जो भी उसकी
सदा विजय हो

धर्मभाव भूतल में छाए
कर्मभाव जन जन में आए
निष्कामी जीवन फल पाए
ईश्वर में विश्वास अटल मन स्वस्थ
नितांत अभय हो

सत्य सनातन नित्य प्रचारें
शुभ कृतियों के तथ्य विचारेँ
निज मानस के दोष सुधारें
करें सभी स्वाध्याय निरंतर पाप सभी
के क्षय हों

ऊंच नीच के भाव बिसारें
कलुष कामना सकल निवारें
समता भाव समाज प्रसारें
सदाचार हो ध्येय हमारा नवयुग का
अभिनय हो

आत्मशक्ति विस्तार करें हम
दीनों का उद्धार करें हम
शरणागत का मान करें हम
निज सर्वस्व राष्ट्र पर वारें, हर प्रभात
संचय हो


इस युग कि पहचान हैं गाँधी | Mahatma Gandhi Poem in Hindi

भारत के सम्मान है गाँधी।
इस युग कि पहचान हैं गाँधी।।

चौराहों पर खड़े है गाँधी।
मैदानो के नाम है गाँधी।।

दीवारों पर टंगे है गाँधी।
पढने -पढ़ाने में है गाँधी।।

राजनीति में भी है गाँधी।
मज़बूरी का नाम हैगाँधी।।

टोपी कि एक ब्रांड है गाँधी।
वोट में गांधी ,नोट में गाँधी।।

अगर नहीं मिलते तो वह है।
जनमानस की सोच में गांधी।।


बापू के प्रति | 2 October Gandhi Jayanti Hindi Kavita

तुम मांस-हीन, तुम रक्तहीन,
हे अस्थि-शेष! तुम अस्थिहीन,
तुम शुद्ध-बुद्ध आत्मा केवल,
हे चिर पुराण, हे चिर नवीन!

तुम पूर्ण इकाई जीवन की,
जिसमें असार भव-शून्य लीन;
आधार अमर, होगी जिस पर
भावी की संस्कृति समासीन!

तुम मांस, तुम्ही हो रक्त-अस्थि,
निर्मित जिनसे नवयुग का तन,
तुम धन्य! तुम्हारा नि:स्व-त्याग
है विश्व-भोग का वर साधन।

इस भस्म-काम तन की रज से
जग पूर्ण-काम नव जग-जीवन
बीनेगा सत्य-अहिंसा के
ताने-बानों से मानवपन!

सदियों का दैन्य-तमिस्र तूम,
धुन तुमने कात प्रकाश-सूत,
हे नग्न! नग्न-पशुता ढँक दी
बुन नव संस्कृत मनुजत्व पूत।

जग पीड़ित छूतों से प्रभूत,
छू अमित स्पर्श से, हे अछूत!
तुमने पावन कर, मुक्त किए
मृत संस्कृतियों के विकृत भूत!

सुख-भोग खोजने आते सब,
आये तुम करने सत्य खोज,
जग की मिट्टी के पुतले जन,
तुम आत्मा के, मन के मनोज!

जड़ता, हिंसा, स्पर्धा में भर
चेतना, अहिंसा, नम्र-ओज,
पशुता का पंकज बना दिया
तुमने मानवता का सरोज!

पशु-बल की कारा से जग को
दिखलाई आत्मा की विमुक्ति,
विद्वेष, घृणा से लड़ने को
सिखलाई दुर्जय प्रेम-युक्ति;

वर श्रम-प्रसूति से की कृतार्थ
तुमने विचार-परिणीत उक्ति,
विश्वानुरक्त हे अनासक्त!
सर्वस्व-त्याग को बना भुक्ति!

सहयोग सिखा शासित-जन को
शासन का दुर्वह हरा भार,
होकर निरस्त्र, सत्याग्रह से
रोका मिथ्या का बल-प्रहार:

बहु भेद-विग्रहों में खोई
ली जीर्ण जाति क्षय से उबार,
तुमने प्रकाश को कह प्रकाश,
औ अन्धकार को अन्धकार।

उर के चरखे में कात सूक्ष्म
युग-युग का विषय-जनित विषाद,
गुंजित कर दिया गगन जग का
भर तुमने आत्मा का निनाद।

रंग-रंग खद्दर के सूत्रों में
नव-जीवन-आशा, स्पृह्यालाद,
मानवी-कला के सूत्रधार!
हर लिया यन्त्र-कौशल-प्रवाद।

जड़वाद जर्जरित जग में तुम
अवतरित हुए आत्मा महान,
यन्त्राभिभूत जग में करने
मानव-जीवन का परित्राण;

बहु छाया-बिम्बों में खोया
पाने व्यक्तित्व प्रकाशवान,
फिर रक्त-माँस प्रतिमाओं में
फूँकने सत्य से अमर प्राण!

संसार छोड़ कर ग्रहण किया
नर-जीवन का परमार्थ-सार,
अपवाद बने, मानवता के
ध्रुव नियमों का करने प्रचार;

हो सार्वजनिकता जयी, अजित!
तुमने निजत्व निज दिया हार,
लौकिकता को जीवित रखने
तुम हुए अलौकिक, हे उदार!

मंगल-शशि-लोलुप मानव थे
विस्मित ब्रह्मांड-परिधि विलोक,
तुम केन्द्र खोजने आये तब
सब में व्यापक, गत राग-शोक;

पशु-पक्षी-पुष्पों से प्रेरित
उद्दाम-काम जन-क्रान्ति रोक,
जीवन-इच्छा को आत्मा के
वश में रख, शासित किए लोक।

था व्याप्त दिशावधि ध्वान्त भ्रान्त
इतिहास विश्व-उद्भव प्रमाण,
बहु-हेतु, बुद्धि, जड़ वस्तु-वाद
मानव-संस्कृति के बने प्राण;

थे राष्ट्र, अर्थ, जन, साम्य-वाद
छल सभ्य-जगत के शिष्ट-मान,
भू पर रहते थे मनुज नहीं,
बहु रूढि-रीति प्रेतों-समान!

तुम विश्व मंच पर हुए उदित
बन जग-जीवन के सूत्रधार,
पट पर पट उठा दिए मन से
कर नव चरित्र का नवोद्धार;

आत्मा को विषयाधार बना,
दिशि-पल के दृश्यों को सँवार,
गा-गा–एकोहं बहु स्याम,
हर लिए भेद, भव-भीति-भार!

एकता इष्ट निर्देश किया,
जग खोज रहा था जब समता,
अन्तर-शासन चिर राम-राज्य,
औ’ वाह्य, आत्महन-अक्षमता;

हों कर्म-निरत जन, राग-विरत,
रति-विरति-व्यतिक्रम भ्रम-ममता,
प्रतिक्रिया-क्रिया साधन-अवयव,
है सत्य सिद्ध, गति-यति-क्षमता।

ये राज्य, प्रजा, जन, साम्य-तन्त्र
शासन-चालन के कृतक यान,
मानस, मानुषी, विकास-शास्त्र
हैं तुलनात्मक, सापेक्ष ज्ञान;

भौतिक विज्ञानों की प्रसूति
जीवन-उपकरण-चयन-प्रधान,
मथ सूक्ष्म-स्थूल जग, बोले तुम
मानव मानवता का विधान!

साम्राज्यवाद था कंस, बन्दिनी
मानवता पशु-बलाक्रान्त,
श्रृंखला दासता, प्रहरी बहु
निर्मम शासन-पद शक्ति-भ्रान्त;

कारा-गृह में दे दिव्य जन्म
मानव-आत्मा को मुक्त, कान्त,
जन-शोषण की बढ़ती यमुना
तुमने की नत-पद-प्रणत, शान्त!

कारा थी संस्कृति विगत, भित्ति
बहु धर्म-जाति-गत रूप-नाम,
बन्दी जग-जीवन, भू-विभक्त,
विज्ञान-मूढ़ जन प्रकृति-काम;

आए तुम मुक्त पुरुष, कहने
मिथ्या जड़-बन्धन, सत्य राम,
नानृतं जयति सत्यं, मा भैः
जय ज्ञान-ज्योति, तुमको प्रणाम!

सुमित्रानन्दन पन्त

इसे भी पढ़े –

Latest Articles

Good Morning Images for Life Advice in Hindi | जिन्दगी की सलाह देते सुप्रभात इमेज

Good Morning Images for Life Advice in Hindi - इस आर्टिकल में जिन्दगी की सलाह देते कुछ बेहतरीन सुप्रभात इमेज दिये हुए है. इन्हें...

संविधान दिवस पर शायरी स्टेटस | Constitution Day Shayari Status in Hindi

Samvidhan Diwas Constitution Day Shayari Status Image in Hindi - इस आर्टिकल में संविधान दिवस पर शायरी स्टेटस इमेज आदि दिए हुए है. इन्हें...