देश भक्ति गीत (Desh Bhakti Geet)

Desh Bhakti Geet in Hindi – फ़िल्म “दीदी (Didi)” में इस गीत को गाया गया हैं. यह फ़िल्म 1959 को रिलीज़ हुई थी. यह सबसे महान गीतकार “साहिर लुधियानवी” के गीतों में से एक हैं. इस फ़िल्म में “सुनील दत्त” एक टीचर की भूमिका में हैं और आजादी के बाद भी होने वाले समस्याओं पर बच्चो का बड़ा मासूम का प्रश्न होंता हैं जिसका उत्तर “सुनील दत्त (टीचर)” बड़े ही मासूमियत से देते हैं.

इस देश की समस्या को देखकर हर किसी के मन में ऐसा ही प्रश्न आता हैं इसलिए इस गाने को इक बार जरूर सुने. इस गाने को आप “स्वतंत्रता दिवस (Independence Day)” पर गा सकते हैं. यह बड़ा ही ख़ूबसूरत गीत हैं.

हमने सुना था एक है भारत (Humne Suna Tha Ek Hai Bharat)

हमने सुना था एक है भारत सब मुल्कों से नेक है भारत,
लेकिन जब नजदीक से देखा सोच समझ कर ठीक से देखा,
हमने नक्शे और ही पाए बदले हुए सब तौर ही पाए,
एक से एक की बात जुदा है, धर्म जुदा है जात जुदा है,
आप ने जो कुछ हम को पढाया, वह तो कही भी नज़र न आया.

जो कुछ मैंने तुम को पढाया, उसमे कुछ भी झूठ नहीं,
भाषा से भाषा न मिले तो इसका मतलब फूट नहीं,
इक डाली पर रह कर जैसे फूल जुदा है पात जुदा,
बुरा नहीं गर यूँ ही वतन में धर्म जुदा हो जात जुदा, अपने वतन में.

वही है जब कुरआन का कहना, जो है वेद-पुराण का कहना
फिर ये शोर – शराबा क्यों है, इतना खून – खराबा क्यों है, अपने वतन में?

सदियों तक इस देश में बच्चो रही हुकूमत गैरों की
अभी तलक हम सबके मुँह पर धुल है उनके पैरों की,
लडवाओ और राज करो, यह उन लोगो की हिकमत थी
उन लोगों की चाल में आना हम लोगों की जिल्लत थी,
यह जो बैर है इक दूजे से यह जो फुट और रंजिश है
उन्ही विदेशी आकाओं की सोची समझी बखशिश है, अपने वतन में.

कुछ इन्सान ब्रहान क्यों है, कुछ इंसान हरिजन क्यों है,
एक की इतनी इज्जत क्यों है, एक की इतनी ज़िल्लत क्यों है?

धन और ज्ञान को ताकत वालों ने अपनी जागीर कहा,
मेहनत और गुलामी को कमजोरों की तक़दीर कहा,
इन्सानों का यह बटवारा वहशत और जहालत है,
जो नफ़रत की शिक्षा दे वह धर्म नहीं है , लानत है,
जन्म से कोई नीच नहीं है, जन्म से कोई महान नहीं,
करम से बढ़कर किसी मनुष्य की कोई भी पहचान नहीं.

अब तो देश में आज़ादी है अब क्यों जनता फरियादी है,
कब जएगा दौर पुराना, कब आएगा नया जमाना?

सदियों की भूख और बेकारी क्या इक दिन में जाएगी,
इस उजड़े गुलशन पर रंगत आते आते आएगी,
ये जो नये मनसूबे है ये जो नई तामीरे है,
आने वाली दौर की कुछ धुधली -धुधली तस्वीरे है,
तुम ही रंग भरोगे इनमें तुम ही इन्हें चमकाओगे,
नवयुग आप नहीं आएगा, नवयुग को तुम लाओगे.