जिंदगी क्या है कविता | Zindagi Kya Hai Poem in Hindi

Zindagi Kya Hai Poem Kavita Poetry in Hindi – इस आर्टिकल में “जिंदगी क्या है ?” पर कविता दी गई है. जैसे हर व्यक्ति की सोच अलग होती है वैसे ही हर व्यक्ति की नजर में जिंदगी के मायने भी अलग होते है. फिर भी हम यह जानने की पूरी कोशिश करते है कि आखिर जिंदगी क्या है ?

जिंदगी क्या है ? किसी एक कविता, गजल या शायरी के माध्यम से नहीं बताया जा सकता है. मगर कोशिश की जा सकती है कुछ हद तक इसे समझने की. हर इंसान की अलग सोच होती है. जैसी सोच होती है वैसी जिंदगी होती है. जिंदगी चाहे जैसी और चाहे जिसकी हो दुःख-सुख दोनों होते है. ज़िंदगी को कुछ कविता और ग़ज़ल के माध्यम से समझने का प्रयास करते है.

Zindagi Kya Hai Poem in Hindi

छिप-छिप अश्रु बहाने वालों, मोती व्यर्थ बहाने वालों
कुछ सपनों के मर जाने से, जीवन नहीं मरा करता है।

सपना क्या है, नयन सेज पर
सोया हुआ आँख का पानी
और टूटना है उसका ज्यों
जागे कच्ची नींद जवानी
गीली उमर बनाने वालों, डूबे बिना नहाने वालों
कुछ पानी के बह जाने से, सावन नहीं मरा करता है।

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माला बिखर गयी तो क्या है
खुद ही हल हो गयी समस्या
आँसू गर नीलाम हुए तो
समझो पूरी हुई तपस्या
रूठे दिवस मनाने वालों, फटी कमीज़ सिलाने वालों
कुछ दीपों के बुझ जाने से, आँगन नहीं मरा करता है।

खोता कुछ भी नहीं यहाँ पर
केवल जिल्द बदलती पोथी
जैसे रात उतार चांदनी
पहने सुबह धूप की धोती
वस्त्र बदलकर आने वालों! चाल बदलकर जाने वालों!
चन्द खिलौनों के खोने से बचपन नहीं मरा करता है।

लाखों बार गगरियाँ फूटीं,
शिकन न आई पनघट पर,
लाखों बार किश्तियाँ डूबीं,
चहल-पहल वो ही है तट पर,
तम की उमर बढ़ाने वालों! लौ की आयु घटाने वालों!
लाख करे पतझर कोशिश पर उपवन नहीं मरा करता है।

लूट लिया माली ने उपवन,
लुटी न लेकिन गन्ध फूल की,
तूफानों तक ने छेड़ा पर,
खिड़की बन्द न हुई धूल की,
नफरत गले लगाने वालों! सब पर धूल उड़ाने वालों!
कुछ मुखड़ों की नाराज़ी से दर्पन नहीं मरा करता है!
गोपालदास “नीरज”


Zindagi Poem in Hindi

इस कविता को मुकेश निर्विकार जी ने लिखा है जिसका शीर्षक “जिंदगी: कई रंग” है.

बे-तरतीब,
बिखरी-बिखरी,
ताम-झाम जैसी जिंदगी!
फीकी-फीकी
रीती-रीती
शाम-जैसी जिंदगी!

खट्टे-खट्टे
मीठे-मीठे
मिलेजुले,
कटे-छिले,
बछपन की बगिया के
आम जैसी जिंदगी!

खुशबू-खुशबू
तीखी-तीखी
बूंद इधर-बूंद उधर,
बिखरे-बिखरे,
छ्लके-छलके,
जाम-जैसे जिंदगी!

नजरें-नजरें,
लुका-छुपी,

दबे पाँव
झुकी-झुकी,
बाजार-ए-आम में
बदनाम-जैसी जिंदगी!

पड़ी-पड़ी,
रुकी-रुकी,
व्यर्थ-इधर,
व्यर्थ,उधर,
बिना किसी ध्येय के,
निष्काम-जैसी जिंदगी!

बीहड़ पथ,
सुमसाम,
सूरज की तेज घाम,
परित्यक्त पथ के किसी
झाड़-झाम जैसी जिंदगी!

व्यस्त इधर, व्यस्त उधर,
भाग इधर, दौड़ उधर
दिल की किसी हसरत के
सर-ए-शाम
कत्लेआम जैसी जिंदगी!

ठहरे-ठहरे,
रुके-रुके,
दुनियाँ से दूर कटे,
गुमनामे मेँ बसर करते,
पिछड़े हुए दूर किसी
गाम जैसी जिंदगी!

कभी इधर-उधर
कभी इज्जत, कभी बे-इज्जत,
कभी दुलार, कभी फटकार,
दरबारे-आम में
हुक्म अदबी करते हुए
भांड जैसी जिंदगी!

लक्ष्य नहीं, तथ्य नहीं,
रस नहीं, वश नहीं,
जंगल में खुले आम
सांड जैसी जिंदगी
मुकेश निर्विकार


जिंदगी क्या है कविता

इस कविता को नीलेश माथुर जी ने लिखा है जिसका शीर्षक है – जिंदगी कुछ इस तरह.

जिंदगी यूँ ही गुज़र जाती है
बातों ही बातों में
फिर क्यों न हम
हर पल को जी भर के जियें,

खुशबू को
घर के इक कोने में कैद करें
और रंगों को बिखेर दें
बदरंग सी राहों पर,

अपने चेहरे से
विषाद कि लकीरों को मिटा कर मुस्कुराएँ
और गमगीन चेहरों को भी
थोड़ी सी मुस्कुराहट बाँटें,

किसी के आंसुओं को
चुरा कर उसकी पलकों से
सरोबार कर दें उन्हें
स्नेह कि वर्षा में,

अपने अरमानों की पतंग को
सपनो कि डोर में पिरोकर
मुक्त आकाश में उडाएं
या फिर सपनों को
पलकों में सजा लें,

रात में छत पर लेटकर
तारों को देखें
या फिर चांदनी में नहा कर
अपने ह्रदय के वस्त्र बदलें
और उत्सव मनाएँ,

आओ हम खुशियों को
जीवन में आमंत्रित करें
और ज़िन्दगी को
जी भर के जियें!
– नीलेश माथुर


Zindagi Kya Hai Poetry in Hindi

जिंदगी की इस लड़ाई को सदा जारी रखो यह रचना रंजना वर्मा जी की है.

जिंदगी की इस लड़ाई को यहाँ जारी रखो
हर दफ़ा झुकना नहीं थोड़ी तो खुद्दारी रखो

जो यहाँ आया उसे जाना पड़ेगा एक दिन
जिंदगी को दोस्त समझो मौत से यारी रखो

ऊबने देना न मन को उलझनें हों लाख पर
पास में बच्चों की थोड़ी-सी तो किलकारी रखो

खेल उल्फ़त को न समझो छोड़ना मत साथ तुम
हमसफ़र के साथ तुम हरदम वफ़ादारी रखो

दोस्त हो सच्चा अगर कुर्बान कर दो जान भी
उसकी खातिर दिल में अपने तुम न मक्कारी रखो

जान कर भोला तुम्हे भरमा न ले कोई बशर
साफ़ रक्खो दिल मगर थोड़ी अदाकारी रखो

ग़म खुशी जो भी मिले स्वागत करो हँसते हुए
रेगजारों में हँसी की भी तो फुलवारी रखो
रंजना वर्मा


मेरी जिंदगी कविता

हार न अपनी मानूँगा मैं !

चाहे पथ में शूल बिछाओ
चाहे ज्वालामुखी बसाओ,
किन्तु मुझे जब जाना ही है —
तलवारों की धारों पर भी, हँस कर पैर बढ़ा लूँगा मैं !

मन में मरू-सी प्यास जगाओ,
रस की बूँद नहीं बरसाओ,
किन्तु मुझे जब जीना ही है —
मसल-मसल कर उर के छाले, अपनी प्यास बुझा लूँगा मैं !

हार न अपनी मानूंगा मैं !

चाहे चिर गायन सो जाए,
और ह्रदय मुरदा हो जाए,
किन्तु मुझे अब जीना ही है —
बैठ चिता की छाती पर भी, मादक गीत सुना लूँगा मैं !

हार न अपनी मानूंगा मैं !
गोपालदास “नीरज”


जिंदगी क्या है – यह सबको समझ में आती है लेकिन जिंदगी को कुछ शब्दों में परिभाषित करना और समेटना बड़ा ही मुश्किल है. मगर मैंने अपने जीवन में इतना जरूर अनुभव किया है कि “यदि कोई इंसान कुछ चाह ले तो वह कोई ना कोई राह निकाल लेता है.

जीवन को सरल बनाने की कोशिश करें। जीवन जितना सरल होगा आप उतना ही सुख का अनुभव करेंगे। बेवजह की जरूरतों को जितना बढ़ाएंगे जीवन में उतना ही दुखी रहेंगे। लालच और दिखावा अक्सर हमें बहुत दुःख देते है लेकिन बिना अनुभव के इस बात को समझ नहीं पाते है.

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