क्षमा पर कविता | Poem on Forgiveness in Hindi

Poem on Forgiveness in Hindi – इस आर्टिकल में क्षमा पर कविता दी गई है. क्षमा एक ऐसा गुण है जो मानव को भी देवता बना दें.

क्षमा करना एक ईश्वरीय गुण है. किसी को अपनी गलती का एहसास हो, वह आत्मग्लानि में हो और हृदय से क्षमा माँगे तो उसे जरूर क्षमा करे देना चाहिए। क्षमा करने से हृदय में भरे घृणा और नफरत का नाश होता है. प्रेम और आनंद की उतपत्ति होती है. क्षमा करने से देने और पाने वाले दोनों को सुख की अनुभूति होती है.

Poem on Forgiveness in Hindi

क्षमा, दया, तप, त्याग, मनोबल
सबका लिया सहारा
पर नर व्याघ्र सुयोधन तुमसे
कहो, कहाँ, कब हारा?

क्षमाशील हो रिपु-समक्ष
तुम हुये विनत जितना ही
दुष्ट कौरवों ने तुमको
कायर समझा उतना ही।

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अत्याचार सहन करने का
कुफल यही होता है
पौरुष का आतंक मनुज
कोमल होकर खोता है।

क्षमा शोभती उस भुजंग को
जिसके पास गरल हो
उसको क्या जो दंतहीन
विषरहित, विनीत, सरल हो।

तीन दिवस तक पंथ मांगते
रघुपति सिन्धु किनारे,
बैठे पढ़ते रहे छन्द
अनुनय के प्यारे-प्यारे।

उत्तर में जब एक नाद भी
उठा नहीं सागर से
उठी अधीर धधक पौरुष की
आग राम के शर से।

सिन्धु देह धर त्राहि-त्राहि
करता आ गिरा शरण में
चरण पूज दासता ग्रहण की
बँधा मूढ़ बन्धन में।

सच पूछो, तो शर में ही
बसती है दीप्ति विनय की
सन्धि-वचन संपूज्य उसी का
जिसमें शक्ति विजय की।

सहनशीलता, क्षमा, दया को
तभी पूजता जग है
बल का दर्प चमकता उसके
पीछे जब जगमग है।
रामधारी सिंह ‘दिनकर’


क्षमा पर कविता

हुआ हृदय आहत कभी,
मेरे विचार, वाणी, व्यवहार से
हुआ मन को क्लेश कभी,
कुलशित कुंठा के ज्वार से!
अनबन, अवगुण क्रोध सभी,
मानवता के दूषण हैं !
क्षमा कीजिये सरल हृदय से
क्योंकि क्षमा वीरों का भूषण हैं.


Poetry on Forgiveness in Hindi

नफरत भरे इस समाज में हमने
सस्कृति से सुंदर गुण भी पाया है,
जो मांग ले कोई गर दिल से क्षमा
फिर हमने दिल से अपनाया है.

जितना सुंदर नाम क्षमा का
उतना हे सुंदर इसका भाव हैं,
मन में क्षमा याचना या क्षमादान
वो सत्य में हृदय से निष्पाप है।

है चरित्र में उसके इत्र सी महक
जो इस गुण से सुशोभित है,
ईश्वर का वास अंतर्मन में उसके
सारा जग ही उससे मोहित है.


Forgive Poem in Hindi

“आह!
मेरा पाप-प्यासा तन
किसी अनजान, अनचाहे, अकथ-से बंधनों में
बँध गया चुपचाप
मेरा प्यार पावन
हो गया कितना अपावन आज!
आह! मन की ग्लानि का यह धूम्र
मेरी घुट रही आवाज़!
कैसे पी सका
विष से भरे वे घूँट…?
जँगली फूल सी सुकुमार औ’ निष्पाप
मेरी आत्मा पर बोझ बढ़ता जा रहा है प्राण!
मुझको त्राण दो…
दो…त्राण….”

और आगे कह सका कुछ भी न मैं
टूटे-सिसकते अश्रुभीगे बोल में
सब बह गए स्वर हिचकियों के साथ
औ’ अधूरी रह गई अपराध की वह बात
जो इक रात….।
बाक़ी रहे स्वप्न भी
मूक तलुओं में चिपककर रह गए।
और फिर
बाहें उठीं दो बिजलियों सी
नर्म तलुओं से सटा मुख-नम
आया वक्ष पर उद्भ्रान्त;
हल्की सी ‘टपाऽटप’ ध्वनि
सिसकियाँ
और फिर सब शांत….
नीरव…..शांत…….।
दुष्यंत कुमार


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