पितृ पक्ष की पूरी जानकारी | Pitru Paksha in Hindi

Pitru Paksha in Hindi ( पितृ पक्ष या पितरपख ) – हिन्दू धर्म के अनुसार माँ-बाप की सेवा को सबसे बड़ा पूजा माना जाता हैं, इसलिए हिन्दू धर्म शास्त्र में पितरों का उद्धार के लिए पुत्र की अनिवार्यता मानी गई हैं. माता-पिता को मृत्यु-उपरान्त लोग विस्मृत न कर दें, इसलिए उनका श्राद्ध करने का विशेष विधान बताया गया हैं. भाद्रपद पूर्णिमा से आश्विन कृष्णपक्ष अमावस्या तक के सोलह दिनों को पितृपक्ष कहते है, जिसमेंलोग अपने पितरों को श्रद्धापूर्वक स्मरण करते है और उनके लिए पिंडदान करते हैं. इसे “सोलह श्राद्ध ( Solah Shraddh )“, “महालय पक्ष ( Mahalay Paksh )“, “अपर पक्ष ( Apar Paksh )” आदि नामो से भी जाना जाता हैं.

पितृ पक्ष 2018 तारीख | Pitru Paksha 2018 Dates

पितृ पक्ष या पितरपख, 16 दिन की वह अवधि (पक्ष/पख) है – 24 सितंबर, 2018 से 8 अक्टूबर, 2018 तक.

पितृ पक्ष के दौरान क्या करें और क्या न करें | Do’s and Don’ts during Pitru Paksha

  • पितृपक्ष या पितरपख के दौरान पान या तम्बाकू युक्त किसी भी पदार्थ का सेवन न करें.
  • पितृपक्ष या पितरपख में लहसुन और प्याज से बना भोजन करने से बचें.
  • पितृ पक्ष में हम दिन-प्रतिदिन की पूजा-अर्चना कर सकते है, परन्तु कोई विशेष धार्मिक पूजा या अनुष्ठान नहीं कर सकते हैं.
  • पशु-पक्षी विशेष रूप से कौवे को अन्न जल आदि अवश्य दें.
  • Pitrupaksha में कांच और लोहें के बर्तनों का इस्तेमाल न करें. Pitru Paksha के दौरान स्वयं और ब्राह्मणों को पत्तल पर भोजन करना और करवाना श्रेष्ठ माना गया हैं.
  • पितृ पक्ष में धार्मिक स्थलों पर घूमने जा सकते हैं.
  • यदि आपकी आर्थिक स्थिति ठीक नहीं है या किसी दबाव में श्राद्ध नहीं करना चाहिए.
  • काले तिल से अंजलि दें.
  • पितरों की संतुष्टि के लिए दोपहर में ब्राह्मणों को भोजन करवाना चाहिए. दोपहर का समय ही पितरों का माना गया है.
  • पितृ पक्ष में जमीन या कोई सम्पत्ति की खरीददारी नहीं करनी चाहिए.
  • पितृपक्ष के दिनों में मांस-मदिरा, मछली, अंडा कभी न खाएं.
  • बासी भोजन ना करें.
  • पितृपक्ष के दौरान शुभ कार्य जैसे – विवाह, गृहप्रवेश आदि से बचना चाहिए.
  • पितृ पक्ष ( Pitru Paksha ) के दौरान रुद्राभिषेक ( Rudrabhishek ) नहीं करना चाहिए.
  • पुरूषों को दाढ़ी और बाल नहीं कटवाना चाहिए.
  • पितृपक्ष में दिन में नहीं सोना चाहिए.
  • पितृ पक्ष में किसी के घर उपहार या मीठा ले जा सकते हैं. आप दूसरों को उपहार भी दे सकते हैं.

पितृपक्ष के लिए प्रसिद्ध स्थान | The Famous Place for the Pitru Paksha

जब बात आती है श्राद्ध कर्म की तो बिहार स्थित ‘गया’ का नाम बड़ी प्रमुखता व आदर के साथ लिया जाता हैं. भारत ही नहीं पूरी दुनिया में श्राद्ध तर्पण के लिए केवल दो स्थान ही प्रसिद्ध है – (1) बोध गया (2) विष्णुपद मंदिर.

विष्णुपद मन्दिर ( Vishnupad Mandir )” वह स्थान है जहाँ माना जाता है कि स्वयं भगवान विष्णु के चरण उपस्थित है, जिसकी पूजा करने के लिए लोग देश के कोने-कोने से आते हैं. गया में जो दूसरा सबसे प्रमुख स्थान “फल्गु नदी” है जिसके लिए दूर-दूर से लोग आते हैं. ऐसा माना जाता है कि भगवान श्रीराम ने स्वयं इस स्थान पर अपने पिता राजा दशरथ का पिंड दान किया था. तभी से ऐसा माना जाता है कि जो व्यक्ति अपने पितरों को निमित्त पिंड दान करेगा तो उसके पितृ उससे तृप्त रहेंगे और वह व्यक्ति अपने पितृऋण से मुक्त हो जाएगा.

पितृ पक्ष में कौए-श्वान और गाय का महत्व | Impotance of Crow-Dog and Cow in Pitru Paksha

श्राद्ध पक्ष ( Shraaddh Paksha ) में पितर, ब्राह्मण और परिजनों के अलावा पितरों के निमित्त गाय, श्वान और कौए के लिए ग्रास निकालने की परंपरा है. गाय में देवताओं का वास माना गया है, इसलिए गाय का महत्व है.

श्वान और कौए पितरों के वाहक हैं. पितृपक्ष अशुभ होने से अवशिष्ट खाने वाले को ग्रास देने का विधान है. दोनों में से एक भूमिचर है, दूसरा आकाशचर. चर यानी चलने वाला. दोनों गृहस्थों के निकट और सभी जगह पाए जाने वाले हैं. श्वान निकट रहकर सुरक्षा प्रदान करता है और निष्ठावान माना जाता है इसलिए पितृ का प्रतीक है. कौए गृहस्थ और पितृ के बीच श्राद्ध में दिए पिंड और जल के वाहक माने गए हैं.

पितृ पक्ष में 16 दिन शुभ कार्य क्यों नहीं होते | Pitru Paksha Mein 16 Din Shubh Kaary Kyon Nahin Hote

पितृपक्ष ( Pitru Paksha ) का सम्बन्ध मृत्यु से है इस कारण यह काल अशुभ माना जाता हैं. जिस प्रकार अपने परिजन की मृत्यु के पश्चात हम शोकाकुल अवधि में रहते है और अपने किसी भी शुभ, नियमित, मंगल, व्यवसायिक और धार्मिक कार्यों को विराम दे देते हैं, वहीं भाव पितृ पक्ष से जुड़ा हैं.

पितृ पक्ष अवधि के दौरान हम पितरों से और पितृ हमसे जुड़े रहते हैं. अतः अन्य शुभ कार्य, शुभारंभ, गृह-प्रवेश, विशेष धार्मिक आयोजन आदि कार्यों को वंचित रखकर हम पितरों के प्रति पूरा सम्मान और एकाग्रता बनाये रखते हैं.