कर्म पर कविता | Karma Poem in Hindi

Karma Poem Kavita Poetry in Hindi – इस आर्टिकल में “कर्म पर कविता” दिया गया है. व्यक्ति के जीवन में सफलता, असफलता, सुख-दुःख सबकुछ हमारे अच्छे और बुरे कर्मों पर निर्भर करता है. ईश्वर ने इस सृष्टि को ऐसा बनाया है कि बिना कर्म किये इंसान प्रसन्न नहीं रह सकता है. भले उसके पास पूरी दुनिया की दौलत हो.

Karma Poem in Hindi

कर्म अच्छे कर लो
यही साथ में जाएगा,
पाप करने वालों को
खुदा से कौन बचाएगा।

अच्छे कर्म से ही
खुशियाँ मिलती है,
चेहरे पर चमक
गुलाब जैसी खिलती है.

मेहनत करने वालो को
मैंने कभी दुखी नहीं देखा है,
सिर्फ बड़ी-बड़ी बात करने वालों को
मैं कभी सुखी नहीं देखा है.

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कर्म में जिसे है आस्था
वो कब किस्मत को मनाता है,
ईश्वर भी परिश्रमी की मदत करते है
यह हर कोई जानता है.


कर्म पर कविता

जब कोई तुम्हें छोटा दिखाएं
तो उसे उत्तर मत दो,
जब कोई तुम्हारी निंदा करे,
तो उसे भी उत्तर मत दो,
जब कोई तुमसे झगड़ना चाहे
तो उससे तुम मत झगड़ो,
छोटा बनकर उसे भी
कोई उत्तर मत दो,
कोई बकवास की बातें करे
तो उसे भी कोई उत्तर मत दो,
अपनी सारी ऊर्जा कर्म करने पर लगाओ
सच कहता हूँ दोस्त
एक दिन मौन रहकर भी
तुम इन सभी को उत्तर दे दोगे
और बहुतों के लिए प्रेरणा बन जाओगे।


कर्म करने की प्रेरणा देने वाली कविता

इस कविता का शीर्षक “उठा कर्म की ध्वजा” है और इसके रचयिता मनोज जैन ‘मधुर’ है. इसे पूरा जरूर पढ़े आपको पसंद आएगा।

उठा कर्म की ध्वजा
तट पर मत कर शोर
जलधि में उतर
डूब कर मोती ला

हासिल हुआ यहाँ कब किसको
बिना किए कुछ बतला दे
उठा कर्म की ध्वजा हाथ में
आलस को चल जतला दे
मन समझाने, भाग्यवाद की
मन्दिर से मत पोथी ला

छोड़ सहारों को पीछू तू
पथ पर चल पड़ एकाकी
तू चाहे तो ला सकता है
धरती पर नभ की झांकी
बड़ी-बड़ी आएंगी खुशियाँ
पहले खुशियाँ छोटी ला

खुली चुनौती दे अम्बर को
आगे बड़कर साहस से
सोना कर दे, छू कर दुनिया
तू दृढ़ता के पारस से
कर सपने साकरा दृष्टि में
विजय श्री की चोटी ला
दीपक जैसा जल
जब तक सॉंसें हैं इस तन में
दीपक जैसा जल

रहा सदा संघर्ष दिये का
घोर अंधेरों से
आशा की लौ कब डरती है
दुख के फेरों से
मेरे मन मत कम होने दे
अन्तर का सम्बल

मंजिल चलने से मिलती है
नदिया कहती है
हवा हमेशा प्राणों को सरसाने बहती है
देख रहा क्यूं कल का रस्ता
आता कभी न कल

निर्झर कहां रूका करते हैं
गति अवरोधों से
हिम्मत वाले कब घबराते
सतत विरोधों से
संशय की ऑंधी से डिगता कब
विश्वास अटल ?

कही न हो मृगजल
बस थोड़ी सी कोशिश भर में
छिपा हुआ है हल
अगर सहेजी आज बॅंूद तो
बचा रहेगा कल

बची रहेगी रंगत, रौनक
धरती की हरियाली
फूल, पॉंखुरी, डाली, बेलें
तितली रंगों वाली
बचा रहेगा खग कुल गौरव
बची रहेंगी पॉंखें
बचे रहेंगे सपन सजीले
सपनों वाली ऑंखें
बूँद-बूँद संचय करने की
हमस ब करें पहल

बचा रहेगा चॅंदा -सूरज
हिमनद, जंगल, बादल
बचा रहेगा वंशी का स्वर
बचा रहेगा मादल
बची रहे मुस्कान अधर की
बची रहे अभिलाषा
रहे धरा पर इतना पानी
रहे न कोई प्यासा
नदिया भी हो पोखर भी हो
कहीं न हो मृगजल

बची रहेगी धरती अपनी
और गगन हम सब का
आने वाले सुख भोगेंगे
संचय के इस तप का
बूँद बूँद संचय से हम सब
इतना जोड़ सकेंगे
सूरज के गुस्से की गरमी
हॅंस हॅंस ओढ़ सकेंगे
दृढ़ संकल्पित मन का होता
है अभियान सफल
मनोज जैन ‘मधुर’


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