युद्ध पर कविता | War Poem in Hindi

War ( Jung ) Poem Kavita Poetry in Hindi – इस आर्टिकल में युद्ध और जंग पर कविता दी गई है. युद्ध सिर्फ विनाश लाता है लेकिन कई बार धर्म की स्थापना, राष्ट्र के स्वाभिमान और शांति की स्थापना के लिए यह आवश्यक होता है.

War Poem in Hindi

कन्हैयालाल सेठिया राजस्थानी भाषा के प्रसिद्द कवि है. आप पद्मश्री, साहित्य अकादमी पुरस्कार, ज्ञानपीठ के मूर्तिदेवी पुरस्कार से सम्मन्ति है. युद्ध के ऊपर उनकी यह एक बेहतरीन कविता है.

युद्ध नहीं है नाश मात्र ही
युद्ध स्वयं निर्माता है,
लड़ा न जिस ने युद्ध राष्ट्र वह
कच्चा ही रह जाता है,
नहीं तिलक के योग्य शीश वह
जिस पर हुआ प्रहार नहीं,
रही कुँआरी मुट्ठी वह जो
पकड़ सकी तलवार नहीं,

हुए न शत-शत घाव देह पर
तो फिर कैसा साँगा है,
माँ का दूध लजाया उसने
केवल मिट्टी राँगा है,
राष्ट्र वही चमका है जिसने
रण का आतप झेला है,
लिये हाथ में शीश समर में
जो मस्ती से खेला है,

उन के ही आदर्श बचे हैं
पूछ हुई विश्वासों की,
धरा दबी केतन छू आये
ऊँचाई आकाशों की,
ढालों भालों वाले घर ही
गौतम जनमा करते हैं,
दीर्नहीन कायर क्लीवों में
कब अवतार उतरते हैं

नहीं हार कर किन्तु विजय के
बाद अशोक बदलते हैं
निर्दयता के कड़े ठूँठ से
करुणा के फल फलते हैं,
बल पौरुष के बिना शान्ति का
नारा केवल सपना है,
शान्ति वही रख सकते जिनके
कफन साथ में अपना है,
उठो न मूंदो कान आज तो
नग्न यथार्थ पुकार रहा,
अपने तीखे बाण टटोलो
बैरी धनु टंकार रहा।
Kanhaiyalal Sethia ( कन्हैयालाल सेठिया )


युद्ध पर कविता

महान कवि रामधारी सिंह ‘दिनकर’ की रचना “रश्मिरथी” से इसे लिया गया है. युद्ध ( Yuddh ) पर कुछ बेहतरीन लाइन्स है. आपको यह जरूर पसंद आएगा।

जीवन के परम ध्येय सुख को, सारा समाज अपनाता है,
देखना यही है कौन वहाँ तक, किस प्रकार से जाता है ?

है धर्म पहुँचना नहीं, धर्म तो जीवन भर चलने में है,
फैला कर पथ पर स्निग्ध ज्योति दीपक समान जलने में है।

यदि कहें विजय, तो विजय प्राप्तहो जाती परतापी को भी,
सत्य ही, पुत्र, दारा, धन, जन; मिल जाते है पापी को भी।

हो जिसे धर्म से प्रेम कभी वह कुत्सित कर्म करेगा क्या ?
बर्बर, कराल, दंष्ट्री बन कर मारेगा और मरेगा क्या ?

पर, हाय, मनुज के भाग्य अभी तक भी खोटे के खोटे हैं,
हम बढ़े बहुत बाहर, भीतर लेकिन, छोटे के छोटे हैं।

मानेगा यह दंष्ट्री कराल विषधर भुजंग किसका यन्त्रण ?
पल-पल अति को कर धर्मसिक्त नर कभी जीत पाया है रण ?

जो ज़हर हमें बरबस उभार, संग्राम-भूमि में लाता है,
सत्पथ से कर विचलित अधर्म की ओर वही ले जाता है।

साधना को भूल सिद्धि पर जब टकटकी हमारी लगती है,
फिर विजय छोड़ भावना और कोई न हृदय में जगती है।

तब जो भी आते विघ्न रूप, हो धर्म, शील या सदाचार,
एक ही सदृश हम करते हैं सबके सिर पर पाद-प्रहार।

उतनी ही पीड़ा हमें नहीं, होती है इन्हें कुचलने में,
जितनी होती है रोज़ कंकड़ो के ऊपर हो चलने में।

सत्य ही, ऊध्र्व-लोचन कैसे नीचे मिट्टी का ज्ञान करे ?
जब बड़ा लक्ष्य हो खींच रहा, छोटी बातों का ध्यान करे ?

जब लोभ सिद्धि का आँखों पर, माँड़ी बन कर छा जाता है
तब वह मनुष्य से बड़े-बड़े दुश्चिन्त्य कृत्य करवाता है।

फिर क्या विस्मय, कौरव-पाण्डव भी नहीं धर्म के साथ रहे ?
जो रंग युद्ध का है, उससे, उनके भी अलग न हाथ रहे।

दोनों ने कालिख छुई शीश पर, जय का तिलक लगाने को,
सत्पथ से दोनों डिगे, दौड़कर, विजय-विन्दु तक जाने को।
रामधारी सिंह दिनकर


Poem on War in Hindi | जंग पर कविता

ज़ुल्म फिर ज़ुल्म है बढ़ता है तो मिट जाता है
ख़ून फिर ख़ून है टपकेगा तो जम जाएगा
तुमने जिस खून को मक़्तल में दबाना चाहा
आज वह कूचा-ओ-बाजार में आ निकला है
कहीं शोला, कहीं नारा, कहीं पत्थर बनकर
खून चलता है तो रूकता संगीनों से
सर उठाता है तो दबता नहीं आइनों से

जिस्म की मौत कोई नहीं होती है
जिस्म मिट जाने से इंसान नहीं मर जाते
धड़कने रूकने से अरमान नहीं मर जाते
सांस थम जाने से ऐलान नहीं मर जाते
होंठ जम जाने से फरमान नहीं मर जाते
जिस्म की मौत कोई मौत नहीं होती है

खून अपना हो या पराया हो
नस्ले-आदम का खून है आखिर
जंग मशरिक में हो या मग़रिब में
अमन-ऐ-आलम का खून है आखिर

बम घरों पर गिरें या सरहद पर
रूहे-तामीर ज़ख्म खाती है
खेत अपने जले कि औरों के
जीस्त फाकों से तिलमिलाती है

जंग तो खुद ही एक मअसला है
जंग क्या मअसलों का हल देगी
आग और खून आज बख़्शेगी
भूख और अहतयाज कल देगी

बरतरी के सुबूत की खातिर
ख़ून बहाना ही क्या जरूरी है
घर की तारीकियाँ मिटाने को
घर जलाना ही क्या जरूरी है

इसलिए, ऐ शरीफ इंसानों !
जंग टलती रहे तो बेहतर है
आप और हम सभी के आँगन में
शमअ जलती रहे तो बेहतर है.
साहिर लुधयानवी ( Sahir Ludhianavi )

कठिन शब्द : मक़्तल = वध स्थल, आईनों = क़ानून , नस्ले-आदम = इंसानो का
मशारिक = पूरब , मग़रिब = पश्चिम , अमन-ए-आलम – विश्व शांति, रूहे-तामीर = निर्माण की आत्मा
ज़ीस्त = जिंदगी, फ़ाक़ा – भूख, मअसला = समस्या, अहतयाज = आवश्यकताएँ, बरतरी = बड़प्पन
तारीकियाँ = अँधेरे , शमअ = दीपक


Yuddh Par Kavita

इंसान में हैवान
यहाँ भी है वहाँ भी
अल्लाह निगहबान
यहाँ भी है वहाँ भी

खूंख्वार दरिंदों के
फ़क़त नाम अलग है
शहरों में बयाबान
यहाँ भी है वहाँ भी

रहमान की कुदरत हो
या भगवान की मूरत
हर खेल का मैदान
यहाँ भी है वहाँ भी

हिन्दू भी मजे में है
मुसलमान भी मजे में
इंसान परेशान
यहाँ भी है वहाँ भी

उठता है दिलो-जाँ से
धुआँ दोनों तरफ ही
ये ‘मीर’ का दीवान
यहाँ भी है वहाँ भी.
निदा फ़ाज़ली ( Nida Fazli )


War Poetry in Hindi | युद्ध और बुद्ध पर कविता

कोई नहीं चाहता है
युद्ध हो…
कोई नहीं चाहता उसका पुत्र
बुद्ध हो…
युद्ध भी होते है…
बुद्ध भी होते है…
युद्ध रक्तपात,
मृत्यु, अश्रु, आफत, तबाही लाता है
फिर भूखमरी और गरीबी बढ़ाता है
पर अंत में शांति छा जाता है.
बुद्ध अपने ज्ञान से
अहंकार, डर, स्वार्थ, लालच
वासना, ईर्ष्या द्वेष को समाप्त करके
मन के भीतर शांति लाते है.
युद्ध और बुद्ध जीवन के सत्य है
कोई कुछ भी कर ले इनसे किसी
का जीवन अछूता नहीं रहेगा।
चक्रधारी पांडेय


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