शहर शायरी | Shahar Shayari

Shahar Shayari

Shahar Shayari ( मेरा शहर शायरी ) – शहर अब कंक्रीट का जंगल बनता जा रहा हैं, ऊँची इमारते, चौड़ी सड़के, चकाचौंध जो मन को मोह ले परन्तु इन शहरों का हकीकत कुछ और ही हैं. लोग अपनी जीविका चलाने के लिए इतने मजबूर हो गये हैं कि शहर में पैसा कमाने के चक्कर में प्रदूषित जल पी रहे हैं और प्रदूषित वायु को ग्रहण कर रहे हैं. हवा और पानी अब तो शहरों में बिकने लगे हैं.

रिश्तों की कोई अहमियत नहीं हैं. स्वार्थ ही इनका सबसे बड़ा रिश्तेदार हैं. जेब में जब पैसा होता हैं तो शहर रंगीन दीखता हैं यदि पैसा न हो तो वीरान सा लगता हैं. इस पोस्ट में शहर पर शायरी ( Shahar Par Shayari ) दी गयी हैं. इसे जरूर पढ़े.

बेस्ट शहर शायरी | Best Shahar Shayari

जा रहा हूँ तेरे शहर से अब दुबारा नहीं आऊँगा.
इतनी मोहब्बत हैं कि तुझे बेवफ़ा भी नहीं कह पाऊँगा.


शहर की यहीं जिन्दगी हैं,
अब तो हवाओं में भी गंदगी हैं.


Shahar Shayari Image in Hindi
Shahar Shayari Image in Hindi

गाँव में रहने वाले इतराते नहीं हैं,
शहर में जीने वाले हकीकत बताते नहीं हैं.


यादों का शहर देखो बिल्कुल वीरान हैं,
दूर-दूर तक न जंगल, न कोई मकान हैं.


शहर में ज़िन्दगी बदल सी गई हैं,
इक कमरें में सिमट सी गई हैं.


यूँ खुद की लाश अपने काँधे पर उठाये हैं
ऐ शहर के वाशिंदों ! हम गाँव से आये हैं
– अदम गोण्डवी


सुना है लोग उसे आंख भर के देखते हैं
तो उसके शहर में कुछ दिन ठहर के देखते हैं
– अहमद फ़राज़


Shahar Shayari Images
Shahar Shayari Images

दिल्ली पर शायरी | Dilli Par Shayari

ख़्वाबों ने मुझे दिल्ली लाया,
यहाँ मैं सब कुछ पाया,
पर इस बात से हैरान हूँ
वो न मिला जो गाँव छोड़ आया.


शहर की ज़िन्दगी शायरी | Shahar Ki Jindagi Shayari

रहने का मजा तो गाँव में हैं,
शहर कहाँ पेड़ की छाँव में हैं.


Shahar Shayari Images in Hindi
Shahar Shayari Images in Hindi

मेरे ख्वाब मुझे शहर ले कर आई,
उदास हो गया भीड़ में देखकर तन्हाई.


शहर और गाँव दोनों बदल गया हैं,
इक ही घर में कई चूल्हा जल गया हैं.


अपना शहर शायरी | Apna Shahar Shayari

पूछा शहर का हाल तो वो मुस्कुरा दिए,
चेहरे की उदासियों ने बाकी हाल बता दिए.


हर किसी के हाथ में बिक जाने को तैयार नहीं,
यह मेरा दिल है आपके शहर का अखबार नहीं.


जो मिरे दिल में है लोगों से छुपाऊँ किस तरह
काँच के इस शहर को ‘ख़ालिद’ बचाऊँ किस तरह
– ख़ालिद शिराज़ी


बिज़नस के नये गुण हर कोई सीखने लगा हैं,
अब तो शहर में हवा-पानी भी बिकने लगा हैं.


ये हम जो शहर के पास अपना गाँव बेचते हैं,
यकीन कीजिये हाथ और पाँव बेचते हैं.


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