गुरू नानक जी का जीवनी और इतिहास | Guru Nanak Biography in Hindi

Guru Nanak Biography in Hindi

Guru Nanak Biography in Hindi – नानक सिखों के प्रथम गुरू है. इनके अनुयायी इन्हें गुरूनानक, नानक, नानक देव जी, बाबा नानक और नानकशाह आदि नामों से सम्बोधित करते है. लद्दाख व तिब्बत में इन्हें नानक लामा भी कहा जाता है. नानक अपने व्यक्तित्व में दार्शनिक, योगी, गृहस्थ, धर्मसुधारक, समाजसुधारक, कवि, देशभक्त और विश्वबंधु सभी के गुण समेटे हुए थे.

गुरू नानक का जीवन परिचय | Guru Nanak Biography in Hindi

नाम – नानक ( Nanak )
प्रसिद्ध नाम – गुरू नानक ( Guru Nanak )
जन्मतिथि – 15 अप्रैल, 1469 ई.
जन्मस्थान – तलवंडी ( आधुनिक ननकान साहब, पाकिस्तान )
माता का नाम – तृप्तादेवी
पिता का नाम – कल्यानचंद ( कालू )
पत्नी – सुलक्षणी
पुत्र – श्रीचन्द और लक्ष्मीचन्द
दार्शनिक मत – एकेश्वरवाद
मृत्युतिथि – 1538 ई.
मृत्युस्थान – करतारपुर

गुरूनानक का प्रारम्भिक जीवन | Early Life of Guru Nanak

गुरू नानक का जन्म 1469 ई. में तलवंडी ( आधुनिक ननकाना साहिब, पाकिस्तान ) के एक मेहता खत्री (प्राचीन क्षत्रीय) नामक परिवार में हुआ था. इनके माता का नाम तृप्ता देवी तथा पिता का नाम कालू था. नानक बचपन से ही सांसारिक मोह से मुक्त थे और बहुत ही उदार स्वभाव के थे. 18 वर्ष की आयु में बटाला के मूलराज खत्री की बेटी, सुलक्षणी से उनका विवाह हुआ, जिससे दो पुत्र उत्पन्न हुए – श्री चन्द और लक्ष्मी चन्द. जब नानक को ज्ञान हुआ तो वे बोले कि – “ना कोई हिन्दू न कोई मुसलमान” यहीं शब्द गुरू नानक के सिद्धांतों का सार है.

नानक ने कबीर का मार्ग अपनाया. नानक उत्तर-पश्चिमी भारत में भक्ति आन्दोलन का सूत्रपात किया. तीस वर्ष की अवधि में इन्होंने देश का पांच बार चक्कर लगाया जिसे उदासीसी कहा जाता हैं. इन्होंने श्रीलंका तथा मक्का-मदीना तक अपनी उपासना का संदेश पहुंचाएं.

गुरूनानक का दार्शनिक मत | Philosophical View of Guru Nanak

नानक एकेश्वर (एक ईश्वर) में विश्वास रखते थे तथा निर्गुण ब्रह्म की उपासना पर बल देते थे. उनका मानना था कि ईश्वर एक है. वह निर्गुण और निरंकार है. परमात्मा के लिए उन्होंने हरि, राम, अल्लाह और खुदा के नामों का भी प्रयोग किया. उन्होंने मुसलमानों को सलाह दी, “दया को मस्जिद बनाओं” नानक ईश्वर की एकता में विश्वास रखते थे. इसी आधार पर उन्होंने हिन्दू और मुसलमान दोनों को नजदीक लाने का प्रयास किये. वे अवतारवाद में विश्वास नहीं करते थे. उनके अनुसार ईश्वर का मनुष्य के रूप में जन्म लेने की कल्पना करना उसे जन्म और मृत्यु के चक्र में बाधना है जबकि ईश्वर इससे मुक्त होता हैं. कबीर की भांति नानक भी गृहस्थ जीवन व्यतीत करते हुए भक्ति द्वारा ईश्वर की प्राप्ति पर बल दिया. उन्होंने धार्मिक कर्मकांडो एवं आडम्बरों की निंदा की. मूर्ति पूजा, छुआ-छूत तथा ऊँच-नीच की भेद-भाव का विरोध किया. “गुरू नानक ने नारी मुक्ति की दिशा में काफी प्रयत्न किये और सती-प्रथा का विरोध किया.” स्त्री को उन्होंने पुरूष का साथी और सहयोगी बताया तथा उन्हें भी समान रूप से मोक्ष प्राप्ति का अधिकार दिया.

गुरू नानक ने लंगर (सामूहिक भोज) की शुरूआत की. उनका सम्बन्ध सूफी संत बाबा फ़रीद से था. नानक और बाबा फ़रीद के पदों में विचारों की समानता मिलती है. नानक ने अपने उपदेशों को छोटी-छोटी कविताओं के रूप में दिए थे जिन्हें सिखों के पांचवें गुरू अर्जुन ने आदि ग्रन्थ में संकलित किया. उसमें जपजी एक मुख्य कविता है जिससे नानक के आध्यात्मिक विचारों का पता चलता हैं.

गुरूनानक जी की मृत्यु | Guru Nanak Death

जीवन के अंतिम दिनों में गुरू नानक जी की ख्याति काफी बढ़ गयी. इन्होंने करतारपुर नामक एक नगर बसाया जो कि पाकिस्तान में है और एक बड़ी धर्मशाला उसमें बनवाई. इसी स्थान पर 22 सितंबर 1539 ई. को इनका स्वर्गवास हो गया.

मृत्यु से पहले इन्होंने अपने शिष्य भाई लहना को अपना उत्तराधिकारी घोषित किया जो बाद में गुरू अंगद देव के नाम से जाने गये.

इसे भी पढ़े –