Brahmo Samaj in Hindi | ब्रह्म समाज की पूरी जानकारी

Brahm Samaj in Hindi

Brahmo Samaj in Hindi ( Brahm Samaj in hindi ) – ब्रह्म समाज हिन्दू धर्म में पहला सुधार आन्दोलन था जिस पर आधुनिक पाश्चात्य विचारधारा का बहुत प्रभाव पड़ा था. राजा राम मोहन राय ( Raja Ram Mohan Roy ) इसके प्रवर्तक थे. ब्रह्म समाज की स्थापना सन् 1828 में हुई. राजा राम मोहन राय बहुमुखी प्रतिभा के धनी व्यक्ति थे. जिस समय पाश्चात्य शिक्षा से प्रभावित हो तरूण बंगाली ईसाई धर्म की ओर आकर्षित हो रहे थे उस समय राजा राम मोहन राय हिन्दू धर्म के रक्षक के रूप में सामने आये. एक ओर उन्होंने पादरी प्रचारकों के विरूद्ध हिन्दू धर्म की रक्षा की और दूसरी तरफ हिन्दू धर्म में आए झूठ और अंधविश्वासों को दूर करने का प्रयत्न किया.

Brahmo Samaj Detail Information in Hindi | ब्रह्म समाज की पूरी जानकारी | Brahm Samaj

इस समाज का उद्देश्य शाश्वत, सर्वाधार, अपरिवतर्य ईश्वर की पूजा हैं जो सारे विश्व के कर्ता और रक्षक हैं. एक नया भवन न्यास-मंडल ( Board of Trustees ) को दे दिया जिसमें मूर्ति पूजा और बलि देने की अनुमति नहीं थी. उनके उपदेशों का तात्पर्य भी सभी धर्मों में आपसी एकता के बंधन को दृढ़ करना था. राजा साहिब स्वयं हिन्दू ही रहे और यज्ञोपवीत पहनते रहे परन्तु 1833 में उनकी इंग्लैंड में अकाल मृत्यु के कारण समाज का मार्ग दर्शन नहीं रहा और धीरे-धीरे उनमें शिथिलता आ गई.

इस संस्था में नया जीवन फूंकने और इसे एक ईश्वरवादी आन्दोलन के रूप में आगे बढ़ाने का श्रेय महर्षि देवेन्द्र नाथ टैगोर (1808-1905) को था. वह इस आन्दोलन में 1842 में सम्मिलित हुए और उन्होंने ब्रह्म धर्म अवलम्बियों को मूर्ति पूजा, तीर्थ यात्रा, कर्मकाण्ड और प्रयाश्चित इत्यादि से रोका. उनके विचार में लकड़ी और पाषाण की मूर्तियों को ईश्वर कैसे माना जाए. ईश्वर को जिस रूप में चाहो पूजो अर्थात कोई गायत्री मन्त्र में भी पूजना चाहे अथवा किसी और साधारण रीति से पूजना चाहे तो भी ठीक हैं. उन्होंने केशव चन्द्र सेन को ब्रह्मा समाज धर्म का आचार्य नियुक्त कर दिया.

केशव चन्द्र सेन की शक्ति, वाकपटुता और उदारवादी विचारों ने इस आन्दोलन को लोकप्रिय बना दिया और शीघ्र ही इसकी शाखाएं बंगाल से बाहर उत्तर प्रदेश, पंजाब और मद्रास में खोल दी गई. 1865 में बंगाल में ही 54 शाखाएं थी. परन्तु उनके उदारवाद के कारण शीघ्र ही ब्रह्मा समाज में फूट पड़ गई. केशव चन्द्र हिन्दू धर्म को संकीर्ण मानते थे और संस्कृत के मूलपाठों के प्रयोग को ठीक नहीं समझते थे. उन्होंने यज्ञोपवीत पहनने के विरूद्ध भी प्रचार किया. इसके पश्चात सभी धर्मों ( ईसाई, मुसलमान, पारसी और चीनी ) की धर्म पुस्तकों क आपात इनकी सभाओं में होने लगा. उन्होंने हिन्दू सामजिक बुराईयों को भी दूर करने का प्रयत्न किया अर्थात हम यह कह सकते हैं कि वह ब्रह्मा समाज को हिन्दू धर्म सुधार आन्दोलन न मान कर एक नया धर्म सुधर आन्दोलन मानने लगे. देवेन्द्रनाथ टैगोर ने ब्रह्मा समाज के एक मात्र प्रन्यासी (Trustee) के रूप में 1865 में केशव चन्द्र सेन को आचार्य की पदवी से निकाल दिया. केशव चन्द्र ने एक नवीन ब्रह्म समाज का गठन कर लिया जिसे वह “आदि ब्रह्म समाज ( Aadi Brahm Samaaj )” कहने लगे. इसमें और सुधारों के अतरिक्ति स्त्रियों के मुक्ति, विद्या प्रसार, सस्ते साहित्य को बांटना, मद्य निषेध तथा दान देने पर अधिक बल था.

1878 में इस समाज में एक और फूट पड़ी. केशव चन्द्र सेन इत्यादि, ब्रह्मसमाजियों के लिए विवाह की न्यूनतम आयु का प्रचार करते थे. परन्तु 1878 में केशव चन्द्र सेन ने अपनी 13 वर्षीय पुत्री का विवाह कूच बिहार के अल्पव्यस्क महाराजा से पूर्ण वैदिक कर्मकाण्ड से कर दिया. कहा यह गया कि यह सब “ईश्वर की आज्ञा है.” केशव चन्द्र सेन के अधिकतर अनुयायियों ने दुखी होकर एक न्य ब्रह्म समाज “साधारण ब्रह्म समाज ( Sadharan Brahm Samaj )” बना लिया. शीघ्र ही केशव चन्द्र का समाज इतिहास के अन्धकार की अस्पष्टता में खो गया.

ब्रह्म समाज ने भारतीय पुनर्जागरण में एक बहुत उत्तम भूमिका निभाई. समाज सुधर के विषय में भी इसका हिन्दू समाज पर प्रभाव हुआ. इन्होने बहुत से अंधविश्वासों तथा हठधर्म को अस्वीकार का दिया. विदेश यात्रा पर समकालीन प्रतिबंधों को चुनौती दी, स्त्रियों की प्रतिष्ठा को बनाने के लिए प्रयत्न किया. बहु-विवाह, सती प्रथा, बाल-विवाह तथा पर्दा प्रथा को समाप्त करने के लिए तथा विधवा विवाह और स्त्री शिक्षा के लिए प्रयत्न किया. इन्होने जातिवाद और अस्पृश्यता को भी हटाने का प्रयत्न किया यद्यपि इसमें वे अधिक सफल नहीं हुए.

ब्रह्म समाज के आधारभूत सिद्धांत | Basic Principles of Brahm Samaj

इसके आधारभूत सिद्धांतों को दो भागों में बाँट सकते हैं – (1) धार्मिक सिद्धांत  (2) सामजिक सिद्धांत

धार्मिक सिद्धांत | Religious Principles

  1. ईश्वर एक तथा सभी गुणों का केंद्र एवं भंडार है.
  2. वह न तो कभी पैदा हुआ और न उसने कभी शरीर धारण किया.
  3. सभी जाति और वर्ण के लोग उसकी पूजा कर सकते है. वह शुद्ध हृदय से ही की जा सकती हैं. उसके लिए मंदिर, मस्जिद तथा एनी प्रकार के बाह्य आडम्बरों की कोई आवश्यकता नहीं हैं.
  4. पाप कर्म छोड़ने तथा उसके लिए पश्चाताप करने से ही मोक्ष की प्राप्ति हो सकती हैं.
  5. किसी भी पुस्तक को दैवी मानने के ज़रूरत नहीं है क्योंकि सभी में कोई न कोई त्रुटि होती है. मानसिक ज्योति और विशाल हृदय से ही ईश्वर के बारें में ज्ञान प्राप्त हो सकता हैं.

समाजिक सिद्धांत | Social Principles

  1. भारतीय समाज में जातीय भेदभाव और छुआछूत का अंत होना चाहिए क्योंकि इन बुराइयों के रहते कोई भी समाज प्रगति नहीं कर सकता हैं.
  2. समाज में अंधविश्वास एवं रूढवादिता का अंत तथा विवेक सम्मत व्यवहार होना चाहिए.
  3. बाल-विवाह प्रथा, बहुविवाह प्रथा, सतीप्रथा और भ्रूण हत्या का अंत होना चाहिए.
  4. समाज में विधवा-विवाह का प्रचलन होना चाहिए.