प्रकृति पर कविता | Poem on Nature in Hindi

Poem on Nature in Hindi – इस आर्टिकल में प्रकृति पर कविता दी गई है, जिसमें बताया गया है कि अगर मनुष्य प्रकृति का ख्याल रखेगा तो प्रकृति भी उसका ख्याल रखेगा.

प्रकृति ही हमारा पालन-पोषण करता है, लेकिन इंसान अपने स्वार्थ और लालच के कारण प्रकृति का विनाश कर रहा है. जिसके कारण अनेक प्रकार की समस्याओं का सामना करना पड़ता है. कई बार प्रकृति जब अपनी भृकुटी तिरछी करती है. तो बड़े-बड़े विनाश और महामारी फ़ैल जाते है. पढ़े-लिखे समाज को प्रकृति का सम्मान करना चाहिए. अगर एक पेड़ सूख जाएँ या कट जाए तो उसके स्थान पर कम से कम 10 पेड़ लगाने चाहिए.

पेड़ों के कटने का ही प्रभाव है कि आज शहरों में शुद्ध हवा तक नही मिल रही है. उसके लिए लोगो को घरों में मशीन लगाना पड़ रहा है. शहर के तनाव, थकान, मानसिक अशांति को खत्म करने के लिए लोग जंगल में और पहाड़ों पर घूमने जाते है. कितनी शांति मिलती है. प्रकृति के करीब रहकर. आइयें प्रकृति पर इस लिखी सुंदर कविता का आनन्द लेते है.

Poem on Nature in Hindi

यह कविता युवा कलमकार वेद प्रकाश ‘वेदान्त’ के द्वारा लिखी गई है. जिसमें बताया गया है इंसान प्रकृति के साथ अपने जीवन को कैसे सुंदर बना सकता है. विज्ञान के आविष्कार हमारे जीवन को आसान बनाते है लेकिन साथ में कोई न कोई समस्या भी लेकर आते है.

प्रकृति पर कविता – भाग 1

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चलो चलते हैं कहीं दूर
भीड़ की इस दुनियाँ से
जहाँ प्रकृति हमें देखे
स्नेहभरी निगाहों से
जिस राह पर वो
कलियाँ बिछाये
महज़ गुजरें हम
उन्हीं राहों से
जहाँ पंक्षी सुनायें
गीत मधुर वेला में
जहाँ टूटे न कोई दिल
जीवन के इस खेला में
जहाँ पूजते हों लोग
नित सुन्दर मन को
जहाँ सम्मान की निगाह से
देखें सभी नारी तन को
जहाँ प्रेम और सौहार्द की
बहती हों चंचल नदियाँ
जहाँ द्वेष और स्वार्थ बिन
बीतती रहें सदियाँ
ईमान का मोल भाव
कहीं कोई न करे
आपसी रंजिश में
कभी कोई न मरे
मानव मानव से
ऊबे नहीं
स्वार्थ पाप के दलदल
में डूबे नहीं
हो परस्पर भावों
विचारों का मिलन
पक्के धागों से हो
रिश्तों का सिलन
हो हर जगह भावनाओं
का पनघट
लगे गोप औऱ गोपियों
का जमघट
भौरों के गुंजन से
लहरायें कलियाँ
अर्पित करें जहाँ
फूलों को डलियाँ
हवाएँ भरें जहाँ
आनंद उर में
लहरें करें गान
एक सुर में
महज़ ख़ुशियों का
फूल खिलता हो जहाँ
चाँदनी से चाँद
मिलता हो जहाँ
वहाँ हो बसेरा
हमारा तुम्हारा
बनें मेघ माली
दे जीवन को फुहारा
जहाँ दादी नानी की
जिंदा कहानी रहे
छोटे बच्चों की सयानी
और मनमानी रहे
जहाँ दूल्हन सी सजी
धरा ओढ़े चूनर धानी
हो न दूषित जहाँ
निर्मल गंगा का पानी
हर मांझी को मिले
सागर का किनारा
मंजिल का राही न
कहे ख़ुद को हारा
आओ चलकर बसें
उस देश रे साथी
जहाँ विचरण करे
देवतुल्य हाथी
जहाँ आशाओं का
हो सुंदर सवेरा
मुनि ज्ञानी जहाँ
करते हों बसेरा
वही कहलाये
प्यारा देश मेरा
वही कहलाये
प्यारा देश मेरा.


प्रकृति पर कविता – भाग 2

भय लगता है हमें
विज्ञान के कारनामों से
ले डूबेंगे पूरी धरती ये
अपने-अपने नामों से
अंधा युग जन्म लेगा
जन्मायेंगे यही
हमें भनक न लगेगी
क्या ग़लत क्या सही !
आँखों पे पर्दा पड़ेगा हमारे
लगेंगे विरोध में एक-दूजे के नारे
खुलेगी आँख तब
जब चीत्कारेगी बस्ती
छोटे बड़े सबकी
सिमट जाएगी हस्ती
अभी से उस दिन के
ख़्वाब आने लगे हैं
रह रहकर मुझको
वो डराने लगे हैं
एक-दूसरे की पीठ में
खंज़र दिखाकर
अंधे युग के राक्षस
मुस्कुराने लगे हैं ।
रह पाना मुश्किल
होता जा रहा है यहाँ
चलो चलते हैं प्रकृति
बाँहें फैलाई हो जहाँ
यहाँ प्रकृति की किसी
को परवाह नहीं है
कट रहे कहीं वृक्ष
जमा कूड़ा कहीं है
स्वार्थवश ज्ञान विज्ञान
इसे छल रहा है
प्रकृति प्रेमी भी हाथ
पे हाथ मल रहा है
रहने लायक न छोड़
रहे इस जहां को
बोलो हम जायें तो
जायें भी कहां को
अब भी है समय
सुधर जाओ तुम
मेरे भावों को समझो
मत मुकर जाओ तुम
प्रकृति भी हँसेगी
और हम भी हँसेंगे
किसी आपदा में
हम तुम न फँसेंगे
ऐसा बदलो ख़ुद को
कि दूर जायें न हम
इतनी दिखाओ इंसानियत
कि लगे अब भी है कम
प्रेम की डुबकी
लगाते चलो
मुस्कुराते चलो
मुस्कुराते चलो.

कवि -वेद प्रकाश “वेदान्त”
प्रयागराज , उत्तर प्रदेश !
मोबाइल – 7897363085


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