जैन मुनि तरुण सागर जी महाराज की जीवनी | Tarun Sagar Ji Maharaj Biography

Tarun Sagar Ji Maharaj Biography in Hindi

Jain Munishree Tarun Sagar Ji Maharaj Biography in Hindi – मुनिश्री तरूण सागर जी जैन परम्परा के सुप्रसिद्ध मुनि थे. मुनिश्री की स्वीकार्यता सिर्फ जैनियों में नहीं, वरन इतर जाति और धर्म के लोगों में भी हैं. वे साधारण संत नहीं थे, बड़े ही विद्रोही और क्रांतिकारी संत थे. इनका बचपन से ही अध्यात्म की ओर झुकाव था. तरुण सागर मुनि अन्य जैन मुनि से बिलकुल भिन्न थे, उनके प्रवचन में हमेशा सामाजिक मुद्दों पर चर्चा की जाती थी.

जैनमुनि तरुण सागर जी की जीवनी | Tarun Sagar Ji Maharaj Biography

नाम – जैन मुनि तरुणसागर जी महराज
बचपन का नाम – पवन कुमार
जन्म – 26 जून 1967
जन्मस्थान – गुहंची गाँव, दमोह, मध्यप्रदेश
मृत्युतिथि – 01 सितम्बर 2018
मृत्यु स्थान – राधेपूरी, दिल्ली
पिता का नाम – प्रताप चन्द्र जैन
माता का नाम – शान्ति बाई जैन

जैन मुनिश्री तरुण सागर जी का जन्म मध्य प्रदेश के दमोह जिले के गुहंची नामक गाँव में हुआ और तब इनका नाम पवन कुमार था. राजस्थान के बागीडोरा के आचार्य “पुष्पदंत सागर” ने उन्हें 20 जुलाई सन् 1988 ई. को दिगंबर मुनि बना दिया. तब वो केवल 20 साल के थे. जीटीवी पर उनके “महावीर वाणी ( Mahaveer Vani )” कार्यक्रम की वजह से तरुण सागर जी को काफी प्रसिद्धी मिली.

मुनिश्री तरूण सागरजी के बारें में | Jain Munishree Tarun Sagar Information

  • 13 वर्ष की उम्र में जैन-सन्यास
  • 20 वर्ष की उम्र में दिगम्बर मुनि दीक्षा
  • 33 वर्ष की उम्र में लाल किले से राष्ट्र को सम्बोधन
  • 35 वर्ष की उम्र में “राष्ट्रसंत” की पदवी से नवाजे गये.
  • 37 वर्ष की उम्र में गुरू-मंत्र दीक्षा देने की नई परम्परा की शुरूआत की.
  • 38 वर्ष की उम्र में ‘भारतीय सेना’ को सम्बोधन व सेना द्वारा ‘गार्ड ऑफ़ ऑनर’ का सम्मान.
  • 39 वर्ष की उम्र में राजभवन (बैंगलोर) में अतिविशिष्ट लोगों को सम्बोधन व श्रवणबेलागोला (कर्नाटक) में अन्तराष्ट्रीय भ. बाहुबली के महामस्तिकाभिषेक महोत्सव में प्रमुख वक्ता.
  • 40 वर्ष की उम्र में अस्वस्थ होने पर भी ( 18 सितम्बर, 2007 कोल्हापुर ) मुनि पद पर बने रहने का ऐतिहासिक निर्णय.
  • 43 वर्ष की उम्र में RSS के मुख्य पथ-संचलन (नागपुर) में सम्मिलित स्वयं सेवकों को सम्बोधन व मुख्यमंत्री निवास (रायपुर) पर प्रवचन.
  • 44 वर्ष की उम्र में मध्यप्रदेश विधानसभा ( 27 जुलाई, 2010 ) व मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री निवास (8 दिसम्बर) को सम्बोधन किया.
  • 45 वर्ष की उम्र में “गिनीज वर्ल्ड ऑफ़ रिकार्ड्स ( Guinness World of Records )” (2 अक्टूबर, 2012, अहमदाबाद) एवं “लिम्का बुक ऑफ़ रिकार्ड्स ( Limca Book of Records )” (28 अगस्त, 2012) में नाम दर्ज.
  • 46 वर्ष की उम्र में 2500 वर्ष के जैन इतिहास में पहली बार दिगम्बर व श्वेताम्बर मुनियों का संयुक्त चातुर्मास (जयपुर 2013)
  • 47 वर्ष की उम्र में 14 वर्ष पश्चात् दिल्ली आगमन पर डायमंड बुक्स द्वारा 14भाषाओं में बहुचर्चित कृति ‘कड़वे प्रवचन’ का प्रकाशन.

दिगम्बर मुनि : एक परिचय

मुनिश्री तरुणसागरजी दिगम्बर जैन मुनि थे. दिगम्बर शब्द का अर्थ होता है, दिग+अम्बर अर्थात दिशाएं ही जिनके वस्त्र हैं. दिगम्बर मुनि होना कोई बच्चों का खेल नहीं हैं. यह आश्चर्य है. केवल वस्त्र छोड़ देने और नग्न हो जाने से कोई दिगम्बर मुनि नहीं हो जाता. दिगम्बर मुनि होने के लिए हर साधक को 28 महासंकल्पों से गुजरना पड़ता हैं, जिन्हें जैन धर्म में मुनि के 28 मूल गुण कहे जाते हैं. जैन मुनि आचरण से जीवंत देवता हैं. उनका सम्पूर्ण जीवन इतना अधिक तप, त्याग और साधनापूर्ण है, जिसकी कोई कल्पना नहीं कर सकता.

आपको नहीं पता होगा कि एक दिगम्बर मुनि 24 घंटे में केवल एक बार अन्न-जल ग्रहण करता है, वह भी खड़े-खड़े, अपनी दोनों अंजुली का ‘करपात्र’ बनाकर. इसके बाद वह कैसी भी स्थिति आये तब भी पानी की एक बूँद भी ग्रहण नहीं करता. सोचिये भीषण गर्मी के दिनों में जब हमें आपको हर दस मिनट में प्यास लगती है तब दिगम्बर मुनि दो-दो घंटे प्रवचन में बोलकर 20-20 किमी., पद विहार करके भी अपने इस संकल्प को निभाता है. कितनी कठिन साधना हैं.

इतना ही नहीं, वह अपने बालों को किसी सैलून में जाकर नहीं कटवाता है, बल्कि हर चार माह में अपने सिर, दाढ़ी और मूंछ के बालों को हाथो से उखाड़कर फेंकता हैं. इस जैन शास्त्रों में ‘केशलोंच’ कहते हैं. जरा आप अपने चार बाल उखाड़कर देखिये तो समझ में आ जाएगा कि दिगम्बर मुनि की साधना कितनी कठिन हैं. सारी जिन्दगी पद विहार करना, हाड़ कंपा देने वाली ठंड हो या भीषण गर्मी हमेशा ही नग्न रहना, मन और इन्द्रियों को जीतकर बालकवत निर्विकार बनना. कभी भी स्नान नहीं करना, दन्त मंजन नहीं करना ( वह भोजन के समय ही एक बार मुख में पानी देते हैं) अखंड ब्रह्मचर्य व्रत पालना, रात्रि में मौन रखना, अपने पास पिच्छी (मयूरपंखी), कमंडल और शास्त्र इन तीनों चीजों (उपकरणों) के अलावा और कुछ भी नहीं रखना आदि उनके नियम होंते हैं.

जैन मुनिश्री तरूणसागर जी की किताब ‘कड़वे प्रवचन’ | Jain Munishree Tarun Sagar Book’s ‘Kadve Pravachan’

समाज के अक्स और नक्श को बदलने के लिए मुनिश्री तरूणसागरजी जैसे शख्स की जरूरत हैं, जो उसे लक्स के तरह धोकर साफ स्वच्छ कर सके.

“कड़वे प्रवचन” का एक-एक सूत्र हीरों से भी तौलो तो वजनी हैं. ‘कड़वे-प्रवचन’ के सूत्र इतने धारदार है कि सीधे कलेजे में धंसते जाते है. हल्के-फुल्के और चुलबुले अंदाज में लिखे गये ये सूत्र विकृतियों और विद्रूपताओं की बखिया उधेड़ कर रख देते हैं. विचारों में पैनापन है, भाषा में उनके व्यक्तित्व जैसा ही बिंदासपन है, कहने को ये ‘कड़वे प्रवचन’ हैं. मगर मेरा यह मनाना है कि इनमें अद्भुत मिठास हैं.