सिया परित्याग – धर्म, प्रेम व त्याग की गौरव गाथा

Siya Parityag Poem By Saurabh Mishra Hindi – यह कविता युवा कवि सौरभ मिश्रा हिन्द जी द्वारा लिखी गयी है. मिश्रा जी मध्यप्रदेश के रीवा जिले के हनुमना के समीप एक छोटे से गांव मुर्तिहा से हैं. सौरभ जी कई महा मंचों में काव्य पाठ कर चुके है व कई समाचार पत्रिकाओं के साथ राष्ट्रीय साप्ताहिक समाचार पत्रिका में भी इनकी रचनाएँ प्रसारित हो चुकी है.

उजेश” नामक साझा काव्य में इनकी तीन रचनाएं चयनीत हो प्रकाशित हुई. इन्हें रेडियो में भी अपनी प्रस्तुति प्रस्तुत करने का अवसर मिला। सौरभ जी को साहित्य जगत के कई बड़े सम्मान प्राप्त है – काव्य सम्मान, युवा कवि सम्मान, उजेश साहित्य सम्मान, काव्यश्री सम्मानसाहित्य गौरव सम्मान. इन्हें नेशनल क्राइम Investigation Bureau द्वारा समाज हित मे कविता के माध्यम से अश्लीलता पर रोक लगाने हेतु आमंत्रित किया गया. इन सब के साथ ही DD MP में इनका साहित्य से जुड़ा साक्षात्कार ( इन्टरव्यू ) हुआ व अन्य news चैनलों पर भी अपनी प्रस्तुति प्रस्तुत कर चुके हैं.

श्री राम प्रिया जनक नन्दनी के , त्याग का गान बखान करू ।
कर जोड़ शीश नवा चरनन , बारम बार प्रणाम करू ।।
सिया परित्याग की व्यथा सुन , करुणा मय मन ये भर आया ।
कैसे सिया सिया को राम राम को , सँभाले जब ये क्षण आया ।।
कैसे आखिर कहा सिया ने , नाथ मैं वन को जाती हूँ ।
पति का धर्म बचाने को , मैं पत्नी धर्म निभाती हूँ ।।
ऐ विधिना क्या तुझे भी तरस ना आई , आखिर क्यू ऐसी मजबूरी दी ।
क्या चौदह वर्ष वनवास कम था , जो जीवन भर की दूरी दी ।।
क्यू विरोध नही किया किसी ने , क्यू धरा नही दो टूक हुई ।
क्यू जगतजननी को वन में भेज दिया , परिस्थिति से कैसे चूक हुई ।।
जो लक्ष्मी नारायण अवतारित हैं , जग जिनका स्तुति बंदन गाता है ।
महाकाल भी जिनको नमन करें , काल उन्हें अपना खेल दिखता है ।।
जिस प्रजा को पुत्र स्नेह दिया , कलंकित किया वही सोच शर्मिंदा थी ।
अरे कहने को तो वो जीवित थी , पर कहा सिया फिर जिन्दा थी ।
बुरा समय जब आन पड़े , तो दास भी आँख दिखाते हैं ।
मीठे वक़्ता मधुभाषी भी , कड़वे बोल सुनाते हैं ।।
महलों में थी जो पढ़ी-बढ़ी , व्याह महल जो जाती है ।
राजरानी जग महारानी को , विधिना भी नाच नचाती है ।।
नंगे पैर अवस्था गर्भित , सिया कैसे कर्तव्य निभा रही ।
कैसी सती पतिव्रता हैं वो , जो उदासी भी ना दिखा रही ।।
राह में अटके दर-दर भटके , संकट ये कैसा आन पड़ा ।
जैसे सत्य का कोई अस्तित्व नही , मूर्क्षित सकल जहांन पड़ा ।।
ऐ समय तूने क्या खेल हैं खेला , क्यों अलग किया राम से राम परछाई को ।
क्यो ठोकर खाते फिरे सिया , क्यों दिया सजा सच्चाई को ।।
कैसे अबला को अकेला छोड़ दिया , जिसका ना कोई सहारा हो ।
पर उसको हाय कोन बचाए , जिसे क़िस्मत ने मारा हो ।।
जग की किस्मत जो बना जाती , हाय उसकी किस्मत कोन बनाएगा ।
जो जग को पार कराती है , वो डूबे तो कोन बचाएगा ।।
कैसे आरोप थोपु श्री राम पे भी , वो भी तो रोए होंगे ।
सिया से जब वो दूर हुए , विरह में कहा सोए होंगे ।।
नींद कैसे आती उनको , कहा चैन की सांस लिए ।
एक वनवास तो वन में काटा था , दूजा महल मे ही वनवास लिए ।।
देखो हाल उस राजा की , कैसे राज धर्म निभाता है ।
प्रजा और राज्य के खातिर , सर्वत्र ही अपना लुटाता है ।।
किसकी बुरी दृष्टि पड़ी , जो जन्मजन्मांतर का बन्धन टूट गया ।
अरे प्राण तो प्राणप्रिया ले गई , शरीर यही क्यों छूट गया ।।
रो ना सकें मन धो ना सकें , कैसा समय ये आया है ।
जो एक दूजे के पूरक हैं , आज उन्हें ही विरह सताया है ।।
सिया अखियन धारा फूट उठी , समन्दर भी सीमा लाँघ गया ।
वर्षों का स्तिर प्रेम आज , दर्द रूर ले जाग गया ।।
हे रघुनंदन हे प्राणप्रिये , हे भक्तवत्सल भगवान सुनो ।
हे जग नायक हे जन नायक , हे पुरुषोत्तम श्री राम सुनो ।।
हार गई मैं इस दुनिया से अब कस्ती लगी किनारा हैं ।
इस शरीर मे इस धरती पर , ये अंतिम मिलन हमारा है ।।
प्रणाम हैं नाथ अनुरोध भी है , दोबारा ना ऐसा होने देना ।
अपनी प्राणप्रिया को स्वामी , विरह में ना रोने देना ।।
धर्म पे अपने स्थिर हो , कब तक कर्तव्य निभाएगी ।
श्री राम से जो दूरी हो , सिया कहा सह पाएगी ।।
हे नाथ चूक क्षमा करो , मुझे ये रीत समझ नही आती हैं ।
आशीष दे नाथ विदा करो , अब भूमिजा भूम समाती हैं ।।
हे मात धरा ले चलो मुझे , जाने की घड़ी अब आई है ।
धरती फ़टी ब्रह्मांड डोला , सिया धरा समाई है ।।
बावरे हो रघुनाथ चीख़ उठे , सब ने ही सुधबुध खोया है ।
मायापति ही माया में पड़ विलख- विलख कर रोया है ।।
हे परम् सती उत्तम चरित , सिया सती मैं तुम्हें प्रणाम करू ।
जितने भी जन्म हमारे हो , हर जन्म तुम्हारे नाम करू ।।
धन्य भाग्य हमारे नाथ , जो गुणगान प्रभु का नाम हुआ ।
शरीर स्वयम ही सिया हुई , प्राण मेरा श्री राम हुआ ।।

कवि – सौरभ मिश्रा हिन्द


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