हिरोशिमा और नागासाकी पर कविता | Poem on Hiroshima and Nagasaki in Hindi

Poem on Hiroshima and Nagasaki Day in Hindi – इस आर्टिकल में हिरोशिमा और नागासाकी दिवस पर कविता दी हुई है. इसे जरूर पढ़े और शेयर करें.

अमेरिका द्वारा हिरोशिमा और नागासाकी पर गिराया गया परमाणु बम पूरे विश्व को याद है. मगर हर देश परमाणु हथियार बनाने की होड़ में है. इंसान क्या चाहता है. यह कह पाना और समझ पाना दोनों ही मुश्किल है. क्योंकि इंसान के अंदर का स्वार्थ इतना विकराल हो चूका है. दोस्तों अगर पूरे विश्व में शांति हो तो सबसे ज्यादा किस देश को नुकसान होता. आपके उत्तर में जो देश आये वो मानवजाति के शत्रु है.

Hiroshima and Nagasaki Day Poem in Hindi

प्रेम और परमाणु

मुझे नफरत है
उस वैज्ञानिक और विज्ञान से
जिसने बन्दूक बनाई है
इसने जितने लोगो को
बचाया नहीं है
उससे कई गुना ज्यादा
लोगो को मौत के
घाट उतार दिया है.

मुझे नफरत है
उस वैज्ञानिक और विज्ञान से
जिसने बम बनाये
इसने जितना सरहदों
को सुरक्षति नही किया है
उससे ज्यादा इंसान
के अंदर डर और
दहशत फैलाया है.

मुझे नफरत है
उस वैज्ञानिक और विज्ञान से
जिसने परमाणु बम बनाया है
जो जीत रुपी अहंकार को
पूरा करने के लिए
बेकसूर लोगो के
शरीर का पूरा जल
सोख लेता है
और तड़प-तड़प कर
मरने के लिए छोड़ देता है.

हिरोशिमा और नागासाकी
का इतिहास आज
भी इंसान को डराता है
फिर भी तरक्की की दौड़ में
परमाणु बम से भी ज्यादा
खतरनाक हथियार बनाने
में लगे हुए है.

अगर विज्ञान यही है
तो आने वाली पीढ़ियों से
मैं यही कहूँगा कि
इस विज्ञान को ना पढ़े

अगर विज्ञान को पढ़े
तो कुछ ऐसा आविष्कार करें
जो मानव कल्याण के लिए हो
न कि उसके अंदर दहशत
और डर फैलाने के लिए
मैं प्रेम से जीने में
विश्वास रखता हूँ,
इंसान एक दिन
इंसान बनेगा
ऐसा आस
रखता हूँ.

लेखक – सत्यप्रकाश दूबे


हिरोशिमा की पीड़ा

किसी रात को
मेरी नींद चानक उचट जाती है
आँख खुल जाती है
मैं सोचने लगता हूँ कि
जिन वैज्ञानिकों ने अणु अस्त्रों का
आविष्कार किया था
वे हिरोशिमा-नागासाकी के भीषण
नरसंहार के समाचार सुनकर
रात को कैसे सोए होंगे?
क्या उन्हें एक क्षण के लिए सही
ये अनुभूति नहीं हुई कि
उनके हाथों जो कुछ हुआ
अच्छा नहीं हुआ!

यदि हुई, तो वक़्त उन्हें कटघरे में खड़ा नहीं करेगा
किन्तु यदि नहीं हुई तो इतिहास उन्हें
कभी माफ़ नहीं करेगा!

लेखक – अटल बिहारी वाजपेयी


हिरोशिमा

एक दिन सहसा
सूरज निकला
अरे क्षितिज पर नहीं,
नगर के चौक :
धूप बरसी
पर अंतरिक्ष से नहीं,
फटी मिट्टी से।

छायाएँ मानव-जन की
दिशाहिन
सब ओर पड़ीं-वह सूरज
नहीं उगा था वह पूरब में, वह
बरसा सहसा
बीचों-बीच नगर के:
काल-सूर्य के रथ के
पहियों के ज्‍यों अरे टूट कर
बिखर गए हों
दसों दिशा में।

कुछ क्षण का वह उदय-अस्‍त!
केवल एक प्रज्‍वलित क्षण की
दृष्‍य सोक लेने वाली एक दोपहरी।
फिर?
छायाएँ मानव-जन की
नहीं मिटीं लंबी हो-हो कर:
मानव ही सब भाप हो गए।
छायाएँ तो अभी लिखी हैं
झुलसे हुए पत्‍थरों पर
उजरी सड़कों की गच पर।

मानव का रचा हुया सूरज
मानव को भाप बनाकर सोख गया।
पत्‍थर पर लिखी हुई यह
जली हुई छाया
मानव की साखी है।

लेखक – सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन “अज्ञेय”


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