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गणेश शंकर विद्यार्थी की जीवनी | Ganesh Shankar Vidyarthi Biography

Ganesh Shankar Vidyarthi Biography in Hindiगणेश शंकर विद्यार्थी का भारत के स्वतन्त्रता संग्राम में महत्वपूर्ण योगदान था. वे एक निष्पक्ष, निडर और बहादुर पत्रकार के साथ-साथ समाज सेवी, स्वतंत्रता सेनानी और राजनीतिज्ञ भी थे. 25 मार्च 1931 में हुए साम्प्रदायिक दंगे की भेंट चढ़ने वाले वे संभवतः पहले पत्रकार थे. यह दंगा कानपुर में हुआ था. गणेश शंकर विद्यार्थी की याद में 25 मार्च को शहीद दिवस के रूप में मनाया जाता हैं.

गणेश शंकर विद्यार्थी की जीवनी | Ganesh Shankar Vidyarthi Biography

नाम – गणेश शंकर विद्यार्थी ( Ganesh Shankar Vidyarthi )
जन्म – 26 अक्टूबर, 1890 ( प्रयाग (इलाहबाद), उत्तर प्रदेश)
मृत्यु – 25 मार्च, 1931 (कानपुर, उत्तर प्रदेश)
मृत्यु का कारण – सांप्रदायिक दंगे में हत्या
पिता – जयनारायण ( Jainarayan )
माता – गोमती देवी
पत्नी – चन्द्रप्रकाश वती विद्यार्थी ( Chandraprakashwati Vidyarthi )
व्यवसाय -पत्रकार
कार्यक्षेत्र – राजनीतिज्ञ, स्वतंत्रता सेनानी, समाज सेवी

गणेश शंकर विद्यार्थी का जन्म 26 अक्टूबर, 1890 को उनके ननिहाल प्रयाग (इलाहबाद), उत्तर प्रदेश में हुआ था. पिता का नाम जयनारायण था और माता का नाम गोमती देवी था. इनके पिता एक अध्यापक थे और फ़ारसी और उर्दू के अच्छे जानकार भी थे.

1905 में, गणेश शंकर विद्यार्थी ने भेलसा से अंग्रेजी मिडिल परीक्षा पास की. 1907 में, कानपुर से एंट्रेंस परीक्षा पास करके आगे की पढ़ाई के लिए इलाहाबाद के कायस्थ पाठशाला कालेज में दाखिला लिया था. पत्रकारिता के प्रति लगाव होने के कारण, उस समय के प्रसिद्ध लेखक पंडित सुंदर लाल के साथ उनके हिंदी साप्ताहिक पत्रिका “कर्मयोगी” के सम्पादन में सहयोग करने लगे. आर्थिक तंगी के कारण अध्ययन के लगभग 1वर्ष के बाद ही उन्होंने कानपुर के “करेंसी ऑफिस” में 30रूपये महीन की नौकरी कर ली. अग्रेजी अधिकारी से कहा-सुनी होने के कारण उन्होंने नौकरी छोड़ दी. उसके बाद कानपुर के पृथ्वीनाथ हाई स्कूल में 1910 तक अध्यापन का कार्य किया.

गणेश शंकर विद्यार्थी के बारें में रोचक जानकारियाँ | Interesting Facts About Ganesh Shankar Vidyarthi

  1. विद्यार्थी जी बड़े सुधारवादी, धर्मपरायण और ईश्वरभक्त थे. प्रभावपूर्ण और उच्च कोटि के वक्ता भी थे. इनका स्वभाव अत्यंत सरल, परन्तु क्रोधी और हठी भी थे.
  2. गणेश शंकर विद्यार्थी जी 1911 में, पं. महाबीर प्रसाद द्वारा संचालित “सरस्वती” पत्रिका के सहायक सम्पादक बनाये गये.
  3. इन्होने 1913को कानपुर से स्वयं अपना हिंदी साप्ताहिक पत्रिका “प्रताप” का सम्पादन करने लगे.
  4. अगस्त 1918 को ‘प्रताप’ पत्रिका में प्रकाशित नानक सिंह की कविता “सौदा-ए-वतन” से नाराज अंग्रेजों ने गणेश शंकर विद्यार्थी पर राजद्रोह का आरोप लगाया व “प्रताप” पत्रिका का प्रकाशन बंद करवा दिया.
  5. साप्ताहिक पत्रिका “प्रताप” के प्रकाशन के सात वर्ष बाद, 1920 में विद्यार्थी जी ने उसे दैनिक कर दिया और “प्रभा” नाम की एक साहित्यिक तथा राजनीतिक मासिक पत्रिका भी अपने प्रेस से निकाली.
  6. ‘सरदार भगत सिंह’ को “प्रताप” से गणेश शंकर विद्यार्थी जी ने ही जोड़ा था.
  7. राम प्रसाद बिस्मिल की आत्मकथा “प्रताप” में छापी थी. विद्यार्थी जी क्रान्तकारियों के विचार व लेख ‘प्रताप’ में निरंतर छपते रहते थे.
  8. कांग्रेस के विभिन्न आंदोलनों में भाग लेने तथा अधिकारीयों के अत्याचारों के विरूद्ध निर्भीक होकर ‘प्रताप’ में लेख लिखने के संबंध में ये पांच बार जेल भी गये.
  9. अपने जेल जीवन में इन्होने विक्टर ह्यूगो के दो उपन्यासों, पहला “ला मिजरेबिल्स” और “नाइंटी थ्री” का अनुवाद किया.
  10. कानपुर के हिन्दू-मुस्लिम दंगे में निस्सहयों को बचाते हुए 25 मार्च 1931 को गणेश शंकर विद्यार्थी शहीद हो गये. उन्ही के याद में 25 मार्च का दिन ‘बलिदान दिवस’ के रूप में मनाया जाता हैं.

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