बालिका दिवस पर कविता | National Girl Child Day Poem in Hindi

Girl Child Day Poem in Hindi

National Girl Child Day Poem in Hindi ( राष्ट्रीय बालिका दिवस पर कविता ) – राष्ट्रीय बालिका दिवस प्रतिवर्ष 24 जनवरी को मनाया जाता हैं. जिसका उद्देश्य भ्रूण हत्या मुक्त समाज, महिला शोषण मुक्त समाज को बनान ताकि नारी अपने शक्ति को पहचाने. देश के विकास में अपना अहम योगदान दे सके. नारी समाज के उत्थान के बिना देश का विकास असम्भव हैं.

हिन्दू पौराणिक कथाओं में नारी शक्ति का रूप मानी गई है. इतिहास में भी वीरांगनाओ ने अपनी शक्ति का परिचय दिया हैं और नारी के लिए प्रेरणा और आदर्श हैं. इस आर्टिकल में बेहतरीन कवितायें दी गई हैं. इसे जरूर पढ़े और शेयर करें.

National Girl Child Day Poem in Hindi

National Girl Child Day Poem in Hindi | Balika Diwas Par Kavita | बालिका दिवस पर कविता

दिल के बहलाने का सामान न समझा जाए
मुझ को अब इतना भी आसान न समझा जाए
मैं भी दुनिया की तरह जीने का हक़ माँगती हूँ
इस को ग़द्दारी का एलान न समझा जाए
अब तो बेटे भी चले जाते हैं हो कर रुख़्सत
सिर्फ़ बेटी को ही मेहमान न समझा जाए
रेहाना रूही


बालिका दिवस पर कविता

जीने का उसको भी अधिकार,
चाहिए उसे थोडा सा प्यार।
जन्म से पहले न उसे मारो,
कभी तो अपने मन में विचारो।
शायद वही बन जाए सहारा,
डूबते को मिल जाए किनारा॥


Rashtriya Balika Diwas Par Kavita

घर की मुस्कान होती है बेटियाँ,
माँ-बाप की जान होती है बेटियाँ,
मुसीबत में खड़ी पास होती है बेटियाँ,
सोचो कितनी महान होती है बेटियाँ.

नाजुक सा दिल रखती है
मासूम सी होती हैं बेटियाँ,
बात बात पर रोती हैं
नादान सी होती हैं बेटियाँ

घर महक उठता है
जब मुस्कुराती है बेटियाँ,
सूनापन फ़ैल जाता है
जब घर से दूर जाती है बेटियाँ

ईश्वर कर वरदान होती है बेटियाँ,
माँ-बाप की मुस्कान होती है बेटियाँ,
दो-दो घरों की जान होती है बेटियाँ,
सोचो कितनी महान होती है बेटियाँ.


राष्ट्रीय बालिका दिवस पर कविता

लाड़ली बेटी जब से स्कूल जाने हैं लगी,
हर खर्चे के कई ब्योरे माँ को समझाने लगी.

फूल सी कोमले और ओस की नाजुक लड़ी,
रिश्तों की पगडंडियों पर रोज मुस्काने लगी.

एक की शिक्षा ने कई कर दिए रोशन चिराग,
दो-दो कुलों की मर्यादा बखूबी निभाने लगी.

बोझ समझी जाती थी जो कल तलक सबके लिए,
घर की हर बाधा को हुनर से वहीं सुलझाने लगी.

आज तक वंचित रही थी घर में ही हक के लिए,
संस्कारों की धरोहर बेटों को बतलाने लगी.

वो सयानी क्या हुई कि बाबुल के कंधे झुके,
उन्हीं कन्धों पर गर्व का परचम लहराने लगी.

पढ़-लिखकर रोजगार करती, हाथ पीले कर चली,
बेटी न बेटों से कम, ये बात सबको समझ में आने लगी.


राष्ट्रीय बालिका दिवस पर कविता हिंदी में

National Girl Child Day Poem in Hindi | बालिका दिवस पर कविता | Girl Child Day Poem in Hindi | Balika Diwas Par Kavita

आने दो इस धरा पे मुझको
नेह भरी निगाह से देख सकूंगी मैं सबको
कसूर क्या है मेरा ये पूछुंगी जग से
भ्रूण हत्या ना करें ये कहूंगी तब जग से

आराध्य से मांगे वरदान
सारे पुण्य व्यर्थ जाएंगे
जब करोगे भ्रूण हत्याएं
सारे जग में कहीं-न कहीं

भ्रूण हत्याओं की हृदय विदारक
खबरें सुन-सुनकर
सिसक रही हूं मैं गर्भ में
मैं तो अभी भ्रूण हूं
किंतु भ्रूण भी तो सीख जाता
अभिमन्यु-सा चक्रव्यूह
भेदने का राज

दुनिया के लोभी चक्रव्यूह
को मैं तोड़ना चाहती हूं
अभी बोल नहीं पाती
लेकिन समझ तो जाती हूं

बेटी हूं तो क्या हुआ
धरा पर आकर
उड़ान भरुंगी नभ में
तैरुंगी गहरे जल में
दौड़ूंगी पथरीले थल में
क्योंकि मुझे भी तो
देश की रक्षा व नाम रोशन करने का हक है

कोयल की कूक बन जाउंगी
फूलों की खुशबु बन महक जाउंगी
रिश्तों का अर्थ सबको समझाउंगी
जीने का अधिकार
ईश्वर ने दिया सब को
तो भला क्यों मारते हो हमें

बस आने तो दो इस धरा पे मुझको
नेह भरी निगाह से देख सकुंगी मैं सबको
कसूर क्या है मेरा पुछुंगी ये तब जग से
भ्रूण हत्या ना करे ये कहूंगी तब मैं सब से


Poem on Girl Child Day in Hindi

चांद की चांदनी ले
सूरज की आभा से दमकी
तारोँ की छाँव मेँ
अभी तो उतरी थी
बीज बन वो नन्हीँ परी
एक माँ की कोख मेँ !

बीज था वो मानव की उत्पत्ति का
बीज था वो ममता की गंगा का
बीज था वो स्नेह के झरने का
बीज था वो त्याग और बलिदान का
धरती पर मानव के उत्थान का !

माँ ने सींचा था उसे अपने ही रक्त मेँ
महसूस किया था स्पंदन जब अपने वजूद मेँ
कितने ही सपने बुन डाले थे पल मेँ
कितने ही रूपोँ मेँ रच लिया था क्षण मेँ
माँ के लिये वो ना नर था ना मादा थी
नर था तो कन्हैया था, मादा थी तो लक्ष्मी थी
गर था तो सिर्फ नव जीवन का एक एहसास वो !

कितनी ही बातेँ उससे कर डालीँ थी उसने
कितनी ही बार उसको सहलाया था कोख मेँ
प्यार के पराग से उसे भिगोया था उसने
तभी एक तूफान आया कहीँ से
पूछ बैठा उसकी पहचान को वो
एक माँ की कोख से ही जनमा था जो
कर बैठा नफरत एक माँ की कोख से ही
जनम लेने न पाये कोई कोख दूसरी
उजाड़ दी वो कोख खिलने से पहले ही !

पूछे तो कोई इन नादान हत्यारोँ से
चुकाते हैँ ऋण क्या जनमदात्री का ऐसे ही
कौन सुनेगा पुकार उस माँ की
नारी ही बन जाये जब दुश्मन नारी की !

सिसक पड़ी वो माँ सुन चीख
कोख मेँ उस अजन्मी परी की
देखी न गई दुर्दशा माँ से
नोच कर कुचली गई कली की
मरती रही है ममता उस माँ की
जब जब पनपी कोख मेँ देह नारी की
कितनी बार चढ़ेगी वो माँ सूली पर
संवेदनहीन समाज के इस विष वृक्ष की !

कैसे खिलेंगे गुलाब उस चमन मेँ
बो रखे है जहाँ बीज बिनौले


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