परमानन्द क्या होता है? | Parmanand Kya Hota Hai?

Parmanand Kya Hota Hai? – परमानन्द की अनुभूति की जा सकती है, लेकिन मनुष्य अपने हृदय पर झूठ, लालच, ईर्ष्या, द्वेष, अहंकार, झूठे दिखावे आदि का बोझ इतना अधिक होता है कि उसे जीवन भर ईश्वर और अध्यात्म का बोध ही नही हो पाता है। इसलिए वह मनुष्य परम आनन्द की अनुभूति नही कर पाता है। सांसारिक और शारीरिक सुख को ही परम आनन्द मान लेता है।

मनुष्य जैसे-जैसे ईश्वर और अध्यात्म के करीब आता है। वैसे-वैसे उसमें विनम्रता बढ़ने लगती है। वह साधारण और सहज होने लगता है। मनुष्य के आंतरिक विकार धीरे -धीरे दूर होने लगते है। फिर आसपास हमें ईश्वर या एक दिव्य शक्ति का आभास होता है। ऐसे साधारण दिखने वाले मनुष्य दिव्य होते है। ऐसे लोग ही जीवन में परम आनन्द की अनुभूति करते है।

जब मनुष्य दुख में होता है और अति असहाय होता है तब उसकी अंतरात्मा ईश्वर को याद करने लगती है। यह स्वाभाविक होता है। इंसान को यह आभास हो जाता है कि कोई ऐसी शक्ति या ईश्वरीय माया है जो उसे इस दुख से निजात दिला देगा। मनुष्य जब खुद को दुखी और कमजोर पाता है तभी ईश्वर को याद करता है इसलिए परम आनन्द की अनुभूति नही कर पाता है। वह ईश्वर से हजारों वादें करता है। लेकिन दुख दूर होते ही वह सब कुछ भूल जाता है। पुनः क्षणिक सुख को ही परम आनन्द समझने लगता है।

बहुत से योगी और ऋषि सब कुछ त्यागने के बाद भी परम आनन्द की प्राप्ति नही कर पाते है क्योंकि इन्होंने अपने हृदय से कुछ नही त्यागा होय है। वो खुद को पूरा जीवन एक भ्रम में रखते है। मनुष्य ज्ञान के द्वारा ही अपने आंतरिक विकार और बुरे विचारों से छुटकारा पाया जक सकता है। सत्य के मार्ग पर जीवन भर चलकर कोई परमानन्द को प्राप्त नही करना चाहता है। इसलिए मनुष्य के जीवन में दुख बढ़ गया है और सुख कम हो गया है।

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परमानन्द की प्राप्ति के लिए अपने विचारों को शुद्ध करते रहिए। इस संसार में रहते हुए। इस संसार का परित्याग करने का प्रयास करें। सांसारिक वस्तुओ के प्रति आसक्ति को कम करें। हृदय के लालच को दूर करने के लिए अपनी यथा शक्ति दान करें । दूसरों की मदत करे। समय मिलने पर ईश्वर का ध्यान करे। अच्छे व्यक्तियों की संगत करे ताकि विचारों में आध्यात्मिकता आये। ताकि परमानन्द की अनिभूति हो सके।

लेख का सार – जब मनुष्य सांसारिक और शारीरिक सुख का त्याग करता है और ज्ञान प्राप्ति के माध्यम से चित्त को ईश्वर में लगाता है। तब उसे परमानन्द की अनुभूति होती है। परमानन्द की प्राप्ति में गुरू का भी महत्वपूर्ण स्थान होता है।

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