Poem on Anti Tobacco Day in Hindi | विश्व तंबाकू निषेध दिवस पर कविता

Poem on Anti Tobacco Day in Hindi

Poem on Anti Tobacco Day 2020 in Hindi – ( विश्व तंबाकू निषेध दिवस पर कविता ) – प्रतिवर्ष 31 मई को विश्व तम्बाकू निषेध दिवस मनाया जाता है. इस पोस्ट में तम्बाकू निषेध दिवस पर बेहतरीन कविता दी गयी है. इसे जरूर पढ़े.

Poem on Anti Tobacco Day in Hindi

आओ सब मिलकर
विश्व तम्बाकू निषेध दिवस मनाते है,
तम्बाकू सेवन और धूम्रपान है बीमारी का कारण
इसे पूरी दुनिया को बताते है.

तम्बाकू कैंसर जैसी बीमारियों का जन्म दाता है,
फिर इंसान इसे इतने चाव क्यों खाता है,
जो भी इंसान बीमारी की चपेट में आता है,
वो पूरा जीवन बड़ा ही पछताता है.

अपने बच्चों को तम्बाकू सेवन से बचाएं,
धुम्रपान से होने वाली बीमारियों को बताएं,
यह जीवन बड़ा ही अनमोल होता है,
स्वस्थ्य जीवन जीने के लाभ को समझाएं.

तम्बाकू का सेवन सबसे अधिक धुम्रपान में होता है,
जिसको पड़ गई है इसकी लत वो चैन से नहीं सोता है,
मन की शान्ति और स्वास्थ्य को खोता है,
बीमार ग्रस्त होकर पूरा जीवन रोता है.

आओ सब मिलकर
विश्व तम्बाकू निषेध दिवस मनाते है,
तम्बाकू सेवन और धूम्रपान है बीमारी का कारण
इसे पूरी दुनिया को बताते है.


World Anti Tobacco Day 2020 Poem in Hindi

वर्ल्ड एंटी टोबैको डे कविता – इंसान तब तक खुश रहता है जब तक वह स्वस्थ्य रहता है. विश्व तम्बाकू निषेध दिवस पर आप यह प्रण ले कि आप खुद को और अपने परिवार को जागरूक बनायेंगे और तंबाकू सेवन करने से बचायेंगे. कितने घरों की खुशियों को छीन लेता है.

बहुत लोग अपने मन में यह भ्रम पाल लेते है कि मरना एक दिन सबको है तो क्यों ना खाकर ही मरे. सबको पता है तम्बाकू के सेवन से कैंसर होता है. जिसे हो जाएँ उसकी मृत्यु निश्चित है. परन्तु मुँह या गले का कैंसर आपको इतना कुरूप बना देता है कि लोग देख कर डर जाते है. इसलिए आप खुद को जागरूक बनाएं. खुद को कैंसर से बचायें.

कश पर कश जो लगा रहे है,
वो अपनी जिन्दगी को धुएँ में उड़ा रहे है,
अपने शरीर को गला रहे है
पास रहने वालो को भी बीमार बना रहे है.

तम्बाकू कैंसर को बुलाती है,
कुछ सालों के बाद हो ही जाती है,
मुँह या गले का कैंसर हो जाएँ,
तो चेहरे को कुरूप बनाती है.

ऐसे हालात में इंसान को लाएँ,
घर के बच्चे भी देख कर डर जाएँ,
कश में डूबती इस दुनिया को कौन बचाएँ,
हो सके तो खुद को और अपने परिवार को जागरूक बनाएँ.


Poem on World Anti Tobacco Day in English Font

Kash Par Kash Jo Lga Rahe Hai,
Vo Apni Jindagee Ko Dhuen Me Uda Rahe Hai,
Apne Shareer Ko Gla Rahe Hai,
Aas-Pas Rahne Walo Ko Bhi Beemar Bna Rhe Hai.

Tambakoo Cancer Ko Bulati Hai,
Kuchh Salo Ke Baad Ho Hee Jati Hai,
Munh Ya Gale Ka Cancer Ho Jaayen
To Chehare Ko Kuroop Banatee Hai.

Aise Haalaat Me Insan Ko Layen,
Ghar Ke Bachche Bhi Dekh Kar Dar Jayen,
Kash Me Doobati Is Duniya Ko Kaun Bachayen,
Ho Sake To Khud Ko aur Apne Pariwar Ko Jaagarook Banayen.


World No Tobacco Day Poem in Hindi

वर्ल्ड नो टोबैको डे कविता – तम्बाकू सेवन की शुरूआत अक्सर दोस्तों के साथ होती है. अक्सर स्कूल में सीनियर या उम्र में बड़े दोस्त तम्बाकू का सेवन करने या धुम्रपान करने के लिए दबाव बनाते है. ऐसी परिस्थिति में आप अपने स्कूल में प्रधानाचार्य और घर पर अपने माता-पिता से जरूर शिकायत करे. अपने अनमोल जीवन को बर्बाद न होने दे. माता-पिता भी अपने बच्चों पर ध्यान दे और उन्हें ऐसी बुरी आदतों से बचाएं.

खैनी, गुटखा, ज़र्दा, पान मसाला,
पैकेट खोल फट से मुँह में डाला,
सस्ता-सा ‘नशा’, मगर होती है शान,
हाँ, मैं भी रखता हूँ ऐब में अपना इक नाम.

धीरे-धीरे उस एक रूपए के पाउच ने,
ऐसा रस घोला मेरे माउथ में,
खाली-खाली सा कुछ लगता है ,
जब गुटखे से मुँह नहीं भरता है.

एक अलग सी महक, एक अलग सा सुकूँ,
क्या हर्ज़ है इसमें, जो मैं इसको चबा लूं ?
लड़की,दारु का शौक नहीं मुझे ,
सिर्फ तम्बाकू की लत से ही तो दिन बुझे.

अब जवानी की उम्र में भी, अगर कोई शौक न किया ,
तो क्या बुढ़ापे में चबायेंगे, हम तम्बाकू की पुड़िया ?

खैनी रगड़ कर जैसे ही जुबां के नीचे रखता हूँ ,
त्यौहार मनाने का दुगना मज़ा अपनी धमनियों में भरता हूँ ,
ज़र्दे की डिबिया से बढ़ती है मेरे कोट की शान ,
पान-मसाला देते ही पार्टी में हो जाती है पहचान.

लम्बे-लम्बे से कश जब सिगरेट के जलते हैं,
कॉलेज की कैंटीन में लड़कियों के दिल मचलते हैं,
वो रह-रह के धुओं के छल्ले उड़ाना ,
सिगरेट पीने का तरीका अपने जूनियर्स को सिखाना.

उम्र चौबीस की जैसे ही मेरी आयी ,
मैं डॉक्टर के पास पहुंचा लेने दवाई ,
भूख लगना एकदम बंद सा हो गया था,
हर खाने का स्वाद, बेस्वाद हो गया था.

मुँह को खोला जब तो दाँत गल गए थे ,
जुबान पर तम्बाकू के निशान छप गए थे ,
गालों में बच रहा था, सिर्फ कुछ चमड़ी का नज़ारा ,
माँ रो रही थी कि बचा लो इसे, ये मेरा लाल है प्यारा.

‘मुँह के कैंसर’ का नाम जैसे ही डॉक्टर ने सुनाया ,
मेरे पैरों तले की धरती में, मानो भूचाल आया
अभी तो इतने सपने बाकी थे मेरे ,
कैसे छूट गए अधूरे वो बिन पढ़े फेरे.

क्यूँ इस तम्बाकू को मैंने गले लगाया ?
अपनी ही कश्ती को पानी में डुबाया ,
जीवन जीने की चाह एक ओर तलबगार थी ,
दूसरी ओर मृत्यु मेरे सर पर सवार थी.

तीन महीने बिस्तर पर मैं तिल -तिल कर मरता रहा ,
अपने अंतिम क्षणों में अपनी नासमझी की कीमत भरता रहा ,
बेज़ार पड़ा बिस्तर पर बस यही एक लेख लिख पाया हूँ ,
‘मुँह के कैंसर’ को मत दो दावत, जिससे मैं अब तक न उभर पाया हूँ.

बहुत से सपने टूट गए, बहुत सी उम्मीदें बह गईं ,
परिवार के लिए न कर सका कुछ, उसकी सूनी माँग भी भरने से रह गयी ,
जलाओ जब भी मुझे तुम शमशान में ले जाकर ,
एक तस्वीर खींच लेना मेरे खुले हुए मुँह की, जनता को दिखाकर.

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