कैफ़ी आज़मी शायरी | Kaifi Azmi Shayari in Hindi

Kaifi Azmi Shayari in Hindi

Kaifi Azmi Shayari in Hindiकैफ़ी आजमी का असली नाम “अख्तर हुसैन रिजवी” था. इनका जन्म उत्तरप्रदेश के आजमगढ़ जिले के छोटे से गाँव मिजवां में 14 जनवरी 1919 में हुआ था. इन्होंने देश भक्ति का अमर गीत – “कर चले फ़िदा, जान-ओ-तन साथियों” लिखी है. इनके लिखे गीत और गजल कई फिल्मों में गायें गये.

कैफ़ी आजमी को भारत सरकार द्वारा पद्मश्री के पुरस्कार से सम्मानित किया जा चूका है. इन्हें कई फिल्मफेयर अवार्ड भी मिले हैं. इस आर्टिकल में Kaifi Azmi की कुछ बेहतरीन शायरी और शेर दिए हुए हैं. इन्हें जरूर पढ़े. आशा करता हूँ आपको पसंद आयेंगे.

Kaifi Azmi Shayari in Hindi

सुना करो मेरी जाँ इन से उन से अफ़्साने
सब अजनबी हैं यहाँ कौन किस को पहचाने


तुम इतना जो मुस्कुरा रहे हो,
क्या गम है जिस को छुपा रहे हो.


जिस तरह हँस रहा हूँ मैं पी पी के गर्म अश्क
यूँ दूसरा हँसे तो कलेजा निकल पड़े


कैफ़ी आज़मी शायरी

बस इक झिजक है यही हाल-ए-दिल सुनाने में
कि तेरा ज़िक्र भी आएगा इस फ़साने में


पेड़ के काटने वालों को ये मालूम तो था
जिस्म जल जाएँगे जब सर पे न साया होगा


जो वो मिरे न रहे मैं भी कब किसी का रहा
बिछड़ के उनसे सलीक़ा न ज़िन्दगी का रहा


Kaifi Azmi Shayari

झुकी झुकी सी नज़र बे-क़रार है कि नहीं
दबा दबा सा सही दिल में प्यार है कि नहीं


मेरा बचपन भी साथ ले आया
गाँव से जब भी आ गया कोई


जो इक ख़ुदा नहीं मिलत तो इतना मातम क्यों
मुझे ख़ुद अपने क़दम का निशाँ नहीं मिलता


कैफ़ी आज़मी के मशहूर शेर

जिन ज़ख़्मों को वक़्त भर चला है
तुम क्यूँ उन्हें छेड़े जा रहे हो


बस्ती में अपनी हिन्दू मुसलमाँ जो बस गए
इंसाँ की शक्ल देखने को हम तरस गए


नई ज़मीन नया आसमाँ भी मिल जाए
नए बशर का कहीं कुछ निशाँ नहीं मिलता


Kaifi Azmi Famous Shayari

लैला ने नया जनम लिया है
है क़ैस कोई जो दिल लगाए


आज फिर टूटेंगी तेरे घर की नाज़ुक खिड़कियाँ
आज फिर देखा गया दीवाना तेरे शहर में


कोई तो सूद चुकाए कोई तो ज़िम्मा ले
उस इंक़लाब का जो आज तक उधार सा है


इंसाँ की ख़्वाहिशों की कोई इंतिहा नहीं
दो गज़ ज़मीं भी चाहिए दो गज़ कफ़न के बाद


Kaifi Azmi and Their Top Sher Shayari

इतना तो ज़िंदगी में किसी के ख़लल पड़े
हँसने से हो सुकून न रोने से कल पड़े


ये किस तरह याद आ रही हो ये ख़्वाब कैसा दिखा रही हो
कि जैसे सच-मुच निगाह के सामने खड़ी मुस्कुरा रही हो


मैं ये सोच कर उस के दर से उठा था
कि वो रोक लेगी मना लेगी मुझ को
हवाओं में लहराता आता था दामन
कि दामन पकड़ कर बिठा लेगी मुझ को
क़दम ऐसे अंदाज़ से उठ रहे थे
कि आवाज़ दे कर बुला लेगी मुझ को


रहने को सदा दहर में आता नहीं कोई
तुम जैसे गए ऐसे भी जाता नहीं कोई
दहर = दुनिया


प्यार का जश्न नई तरह मनाना होगा
ग़म किसी दिल में सही ग़म को मिटाना होगा


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