Motivational Poem | उत्साहवर्धक कविता

नर हो, न निराश करो मन को

कुछ काम करो, कुछ काम करो,
जग में रह कर कुछ नाम करो,
यह जन्म हुआ किस अर्थ अहो,
समझो जिसमें यह व्यर्थ न हो,
कुछ तो उपयुक्त करो तन को,
नर हो, न निराश करो मन को.

संभलो कि सुयोग न जाय चला,
कब व्यर्थ हुआ सदुपाय भला,
समझो जग को न निरा सपना,
पथ आप प्रशस्त करो अपना,
अखिलेश्वर है अवलंबन को,
नर हो, न निराश करो मन को.

जब प्राप्त तुम्हें सब तत्त्व यहाँ,
फिर जा सकता वह सत्त्व कहाँ,
तुम स्वत्त्व सुधा रस पान करो,
उठके अमरत्व विधान करो,
दवरूप रहो भव कानन को,
नर हो न निराश करो मन को.

निज गौरव का नित ज्ञान रहे,
हम भी कुछ हैं यह ध्यान रहे,
मरणोंत्‍तर गुंजित गान रहे,
सब जाय अभी पर मान रहे,
कुछ हो न तज़ो निज साधन को,
नर हो, न निराश करो मन को.

प्रभु ने तुमको कर दान किए,
सब वांछित वस्तु विधान किए,
तुम प्राप्‍त करो उनको न अहो,
फिर है यह किसका दोष कहो,
समझो न अलभ्य किसी धन को,
नर हो, न निराश करो मन को.

किस गौरव के तुम योग्य नहीं,
कब कौन तुम्हें सुख भोग्य नहीं,
जान हो तुम भी जगदीश्वर के,
सब है जिसके अपने घर के,
फिर दुर्लभ क्या उसके जन को,
नर हो, न निराश करो मन को.

करके विधि वाद न खेद करो,
निज लक्ष्य निरन्तर भेद करो,
बनता बस उद्‌यम ही विधि है,
मिलती जिससे सुख की निधि है,
समझो धिक् निष्क्रिय जीवन को,
नर हो, न निराश करो मन को,
कुछ काम करो, कुछ काम करो.
मैथिलीशरण गुप्त



वृक्ष हों भले खड़े,
हों घने हों बड़े,
एक पत्र छाँह भी,
माँग मत, माँग मत, माँग मत,
अग्निपथ अग्निपथ अग्निपथ.

तू न थकेगा कभी,
तू न रुकेगा कभी,
तू न मुड़ेगा कभी,
कर शपथ, कर शपथ, कर शपथ,
अग्निपथ अग्निपथ अग्निपथ.

यह महान दृश्य है,
चल रहा मनुष्य है,
अश्रु श्वेत रक्त से,
लथपथ लथपथ लथपथ,
अग्निपथ अग्निपथ अग्निपथ.
हरिवंश राय बच्चन



जा तेरे स्वप्न बड़े हों.

भावना की गोद से उतर कर,
जल्द पृथ्वी पर चलना सीखें.

चाँद तारों सी अप्राप्य ऊचाँइयों के लिये,
रूठना मचलना सीखें.

हँसें, मुस्कुराएँ, गाएँ.

हर दीये की रोशनी देखकर ललचायें,
उँगली जलाएँ.
अपने पाँव पर खड़े हों,
जा तेरे स्वप्न बड़े हों.
दुष्यंत कुमार



क्या हार में, क्या जीत में
किंचित नही भयभीत मैं
कर्त्तव्य पथ पर जो भी मिला
यह भी सही वो भी सही
वरदान नही माँगूगा
हो कुछ पर हार नही मानूँगा

अटल बिहारी वाजपेयी



बाधाएँ आती हैं आएँ,
घिरें प्रलय की घोर घटाएँ,
पाँवों के नीचे अंगारे ,
सिर पर बरसे यदि ज्वालाएँ,
निज हाथों में हँसते-हँसते,
आग लगाकर जलना होगा,
क़दम मिलाकर चलना होगा.
अटल बिहारी वाजपेयी