रक्षा बंधन | Raksha Bandhan

Raksha Bandhan

रक्षा बंधन बड़ा ही प्यारा हिन्दू त्यौहार हैं जो हर साल श्रावण मास की पूर्णिमा के दिन इसे बड़े उत्साह और उल्लास के साथ मनाया जाता हैं. इस त्यौहार में बहन अपने भाई के हाथ में राखी (रक्षा सूत्र) बाधकर लम्बी उम्र की प्रार्थना करती हैं और भाई अपनी बहन की हर मुसीबत से रक्षा करने का वचन देता हैं और उपहार भी दिया जाता हैं. इस त्यौहार में बहन अपने भाई को टीका लगाकर राखी (रक्षा सूत्र) बांधती हैं और राखी बाधने के बाद बहन अपने भाई को मिठाई भी खिलाती हैं.

यह रक्षा सूत्र कई जगहों पर गुरु जन (ब्राह्मण) के द्वारा भी बाधा जाता हैं जिसमें वे लम्बी उम्र का आशीर्वाद देते हैं. कुछ सार्वजानिक कार्यक्रमों में भी नेता या किसी गण मान्य व्यक्ति को भी रक्षा सूत्र बाधकर लम्बी उम्र की प्रार्थना करते हैं.

अब तो पेड़ों की रक्षा के लिए पेड़ो पर राखी बाधने की परम्परा देखने को मिलती हैं जिससे पेड़ों की रक्षा के लिए लोग वचनबद्ध हो और पेड़ों के साथ-साथ प्रकृति की भी रक्षा हो सके. ब्राह्मण या गुरुजन जब रक्षा सूत्र को बाधते है तो इस संस्कृति श्लोक को पढ़ते हैं.

येन बद्धो बलिराजा दानवेन्द्रो महाबल:
तेन त्वामपि बध्नामि रक्षे मा चल मा चल.

श्लोक का हिन्दी में अर्थ – “जिस रक्षा सूत्र से महान शक्तिशाली दानवेन्द्र राजा बलि को बाँधा गया था, उसी सूत्र से मैं तुझे बाँधता हूँ। हे रक्षे (राखी)! तुम अडिग रहना.

रक्षा बंधन कब हैं? (When is Raksha Bandhan?)

07 अगस्त2017 (सोमवार)
26 अगस्त 2018 (रविवार)
15 अगस्त 2019 (वृहस्पतिवार)
03 अगस्त 2020 (सोमवार)

रक्षा बंधन पौराणिक कथा (Raksha Bandhan Pauraanik Katha)

स्कन्द पुराण और श्रीमद्भागवत में वामन अवतार नामक कथा में रक्षाबंधन का प्रसंग मिलता हैं जिसकी कथा कुछ इस प्रकार से हैं –

दानवेन्द्र राजा बलि ने जब सौ यज्ञ पूर्ण कर लिया और इंद्र देव का स्वर्ग छिनने का प्रयास किया तो इंद्र और अन्य देवता गण भगवान् विष्णु से इस समस्या का समाधान के लिए प्रार्थना किये. तब प्रभु ने वामन अवतार लेकर ब्राह्मण का वेश रख कर राजा बलि से भिक्षा मागने पहुँचे. अपने गुरु के मन करने पर भी दानवेन्द्र राजा बलि ने तीन पग जमीन देने का वचन दे दिया. भगवान् वामन ने अपने तीन पग में तीनो लोक (आकाश, पाताल और धरती) नापकर राजा बलि को कंगाल कर दिया. इस प्रकार भगवान् वामन के द्वारा राजा बलि का घमंड टूट गया.

उसके पश्चात्, राजा बलि ने भगवान् विष्णु की घोर तपस्या और भक्ति की और भगवान् विष्णु को दिन-रात अपने सामने रहने का वचन ले लिया. भगवान् विष्णु जी के घर न लौटने पर माँ लक्ष्मी परेशान होकर नारद जी से उपाय पूछा. उस उपाय के अनुसार लक्ष्मी जी ने राजा बलि के पास जाकर उसे रक्षा बंधन बाधकर अपना भाई बनाया और उपहार में पाने पति को पाने साथ ले आई. वह दिन श्रावण मास की पूर्णिमा थी.