कबीर के दोहे (Kabir Ke Dohe)

Kabir Ke Dohe

Kabir Ke Dohe – कबीर के दोहे आज भी हमें बहुत सारी ज्ञान की बाते  बताते हैं. कबीर जी हिंदी साहित्य के भक्ति युग में ज्ञानाश्रयी- निर्गुण शाखा के महान कवि थे. कबीर पढ़े-लिखे नही थे फिर भी उनके दोहे आज भी बहुत प्रसिद्ध और प्रचलित हैं.

कबीर की जीवनी संक्षिप्त में (Kabir Ki Jeevni Sankshipt Me )

जन्म       1398 ई०
जन्म स्थान वाराणसी,उत्तर प्रदेश, (भारत)
मृत्यु 1494 ई०
मृत्यु स्थान मगहर, उत्तर प्रदेश, भारत
कार्यक्षेत्र कवि, भक्त, सूत कातकर कपड़ा बनाना
भाषा हिन्दी
प्रमुख कृतियाँ बीजक “साखी ,सबद, रमैनी”

 

कबीर के गुरु (Kabir Ke Guru)

कबीर के गुरु  तलाश के बारे में कहा जाता हैं कि वह वैष्णव संत आचार्य रामानंद को अपना गुरू बनाना चाहते थे लेकिन उन्होंने कबीर दास जी को अपना शिष्य बनाने से इंकार कर दिया. कबीरदास जी ने आचार्य रामानन्द जी को अपने हृदय से अपना गुरु मान लिया था. वह इसके लिए कुछ भी करने को तैयार थे.

कबीरदास जी के मन में एक विचार आया कि स्वामी रामानन्द जी सुबह चार बजे गंगा स्नान करने जाते हैं उनके मार्ग के सीढियों पर लेटने की योजना बनाई और उन्होंने ऐसा ही किया.  कबीरदास सीढियों पर लेट गये और रामानन्द जी गंगा स्नान के लिए जैसे-ही सीढियों से नीचे उतरे तभी उनका पैर कबीर के शरीर पर पड़ गया. उनके मुख से “राम-राम” निकला. उसी “राम ” को कबीर ने दीक्षा-मन्त्र मान लिया और रामानंद को अपना गुरु बना लिए.

कबीर के दोहे (Kabir Ke Dohe)

कबीरदास जी के दोहे आज भी मानवजाति के लिए प्रेरणादायक हैं. यह दोहे हमारे हृदय में सकारात्मक उर्जा का संचार कर देते हैं यह हमे वह ज्ञान देते हैं जो शायद एक मोटिवेशनल किताब को भी पढने से न मिले. कबीर जी अपने सामान्य शब्दों से बड़ी-बड़ी बाते बड़े ही खूबसूरत तरीके से कहते है. कबीरदास जी के ज्ञान को जानने के लिए आपको उनके दोहों को पढना पड़ेगा.

गुरु गोविन्द दोनों खड़े, काके लागु पाए,

बलिहारी गुरु आपनो, गोविन्द दियो मिलाय.

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पोथी पढ़ि पढ़ि जग मुआ, पंडित भया न कोय,

ढाई आखर प्रेम का, पढ़े सो पंडित होय.

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 बड़ा हुआ तो क्या हुआ जैसे पेड़ खजूर,

पंथी को छाया नहीं फल लगे अति दूर.

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जाति न पूछो साधु की, पूछ लीजिये ज्ञान,

मोल करो तरवार का, पड़ा रहन दो म्यान।

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अति का भला न बोलना, अति की भली न चूप,

अति का भला न बरसना, अति की भली न धूप.

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चाह मिटी, चिंता मिटी, मनवा बेपरवाह,

जिसको कुछ नहीं चाहिए वह शहनशाह.

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बुरा जो देखन मैं चला, बुरा न मिलिया कोय,

जो दिल खोजा आपना, मुझसे बुरा न कोय.

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माटी कहे कुम्हार से, तू क्या रौंदे मोये,

एक दिन ऐसा आयेगा मैं रौंदूंगी तोय.

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धीरे-धीरे रे मना, धीरे सब कुछ होय,

माली सींचे सौ घड़ा, ॠतु आए फल होय.

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दुःख में सुमिरन सब करे, सुख में करै न कोय,

जो सुख में सुमिरन करे दुःख काहे को होय.

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माला फेरत जुग भया, फिरा न मन का फेर,

कर का मनका डार दे, मन का मनका फेर.

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साधु ऐसा चाहिए, जैसा सूप सुभाय,

सार-सार को गहि रहै, थोथा देई उड़ाय,

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मक्खी गुड में गडी रहे, पंख रहे लिपटाये,

हाथ मले और सिर ढूंढे, लालच बुरी बलाये.

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कबीर संगत साधु की, नित प्रति कीजै जाय,

दुरमति दूर बहावासी, देशी सुमति बताय.

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निंदक नियरे राखिए, ऑंगन कुटी छवाय,

बिन पानी, साबुन बिना, निर्मल करे सुभाय.

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साईं इतना दीजिये, जा में कुटुम समाय,

मैं भी भूखा ना रहूँ, साधू ना भूखा जाय.

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तिनका कबहुँ ना निन्दिये, जो पाँवन तर होय,

कबहुँ उड़ी आँखिन पड़े, तो पीर घनेरी होय।

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दुर्लभ मानुष जन्म है, देह न बारम्बार,

तरुवर ज्यों पत्ता झड़े, बहुरि न लागे डार.

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माया मरी ना मन मरा, मर-मर गए शरीर,

आशा तृष्णा ना मरी, कह गए दास कबीर।

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बोली एक अनमोल है, जो कोई बोलै जानि,

हिये तराजू तौलि के, तब मुख बाहर आनि.

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कबीर दोहावली

यदि आप कबीरदास के दोहों के बारे में और जानना चाहते हैं तो नीचे दिए लिंक पर क्लिक करे.

कबीर के 100 दोहे – भाग 1 (Kabir Ke 100 Dohe – Part 1)

कबीर के 100 दोहे – भाग 2 (Kabir Ke 100 Dohe – Part 2)

कबीर के जीवन से सीख

  • कबीर बहुत ज्यादा पढ़े-लिखे नही थे फिर भी कबीर के दोहों में ज्ञान की गंगा बहती हैं. इसकी वजह हैं साधु-संगति. हमे भी अपने जीवन में अच्छे लोगो के साथ रहना चाहिए. वो हमे कुछ दे या न दे लेकिन उनसे हमे बहुत कुछ सिखने को मिलता हैं.
  • कबीर, फ़कीरो की ज़िन्दगी जीते थे. वह समाज के कुरीतियों, अन्धविश्वास और कर्मकांड को नही मानते थे और समाज की भलाई के लिए लोगो को जागरूक करते थे. इसी वजह से कबीरदास इतने बड़े और महान कवि बने. हमे भी दूसरो की भलाई और सामाज के सुधार के लिए प्रयत्न करना चाहिए.
  • कबीर सूत काटकर अपना जीवनयापन करते थे फिर भी उनमे संतोष था. हमे भी जो ईश्वर ने दिया हैं उसमें संतोष रखते हुए ईमानदारी से प्रयास करना चाहिए.

कबीरदास के बारे में प्रचलित दन्त कथाएँ

कबीरदास जी के बारे में बहुत सारी दन्त कथाएँ प्रचलित हैं जिनमे से कुछ नीचे दिए गये हैं.

दन्त कथा 1 जैसाकि सभी लोग जानते हैं कि कबीरदास जी अन्धविश्वास और पाखंड को नही मानते थे. उस समय ऐसा माना जाता था कि जो व्यक्ति “काशी (वाराणसी)” में मरेगा उसे स्वर्ग मिलेगा और जो व्यक्ति “मगहर” में मरेगा उसे सीधे नर्क में जाना पड़ेगा. हर व्यक्ति आपने अंतिम समय में काशी में रहना पसंद करता था ताकि मरने के बाद उसे स्वर्ग मिले. इस अन्धविश्वास को तोड़ने के लिए अपने अंतिम समय में वो “मगहर” में जा कर रहने लगे और उनकी मृत्यु भी मगहर में ही हुआ था. कुछ लोग यह भी करते हैं कि “मगहर” में जाने के बाद कबीर जी ने अपने पैर कटवा दिया थे ताकि वह वापस या काशी या किसी अन्य जगह न जा सके.

आज वर्तमान समय में इस तरह की अवधारणा नही हैं, लोग इस तरह के अन्धविश्वास में विश्वास नही करते हैं.

दन्त कथा 2 – कबीर के पुत्र का नाम “कमाल” था. कबीर और उनके पुत्र की विचारधारा एक दुसरे से नही मिलती थी. कबीर के पास जब कोई व्यक्ति कुछ उपहार लेकर आता था तो वो लेने से मना कर देते थे जबकि कबीर का पुत्र उस उपहार को ले लेता था.

कहानी कुछ इस तरह से है कि ऐसा माना जाता था कि कबीरदास जी को जादू आता था एक बार कबीरदास और उनके एक मित्र में शर्त लग गयी कि हम अपने शक्तियों का परिचय देंगे. कबीरदास जी ने मंजूर कर लिया. उन्होंने कहा कि मैं अपने घर में छिप रहा हूँ और आप मुझे पूरे दिन में ढूढ़ कर दिखाओ. उनका मित्र यह चुनौती स्वीकार कर लिया. कबीर जी घर में घुसे और गायब हो गये. कबीर दास के मित्र ने उन्हें बहुत ढूढ़ा पर नही मिले. उन्हें समझ में नही आ रहा था कि कबीरदास जी कहा गये. कबीरदास के मित्र को लगा कि मैं यह शर्त हार जाऊंगा. उन्हें पता था कि कबीर और कबीर के पुत्र में बनती नही हैं इसलिए इस शर्त को जीतने के लिए “कमाल” से मदत माँगी और कमाल ने अपने पिता का राज बता दिया. कमाल ने कहा कि मेरे पिताजी उस कठवत में रखे पानी में हैं उसे आप गर्म करे. आपके सामने मेरे पिता जी आ जायेंगे. कबीर के मित्र में वैसा ही किया और कबीर जी को अपने मित्र के सामने आना पड़ा और शर्त को हार गये.