Gita Updesh in Hindi | गीता उपदेश हिंदी में

Gita Updesh in Hindi (गीता उपदेश हिंदी में) – श्रीमद्भागवद गीता हिन्दुओ का एक पवित्र ग्रन्थ हैं. महाभारत के युद्ध में, भगवान् श्री कृष्ण ने गीता का उपदेश (Gita Ka Updesh) अर्जुन को सुनाया था. श्रीमद्भागवद गीता की सबसे ख़ास बात यह हैं कि इनका अर्थ समझना अत्यंत सरल हैं परन्तु आशय समझना अत्यंत कठिन हैं. महाभारत काल से ही, विद्वानों का मत हैं कि ऐसा पुस्तक (ज्ञान की बाते) लिखना किसी मनुष्य के लिए असम्भव हैं.

भगवान् श्री कृष्ण के जीवन से सीख

  1. मनुष्य के जीवन में संगीत और कला का विशेष स्थान होना चाहिए. भगवान् श्री कृष्ण बाँसुरी बजाते थे जिससे हम सन्देश मिलता हैं कि जीवन को सुंदर और बेहतर बनाने में संगीत और कला का विशेष योगदान होता हैं.
  2. निर्बल व कमजोर लोगो की हमेशा मदत करनी चाहिए जैस भगवान् श्री कृष्ण ने अपने बचपन के मित्र सुदाम और षडयंत्र के शिकार पांडवो की मदत की थी.
  3. मनुष्य को अपने शक्तियों का गलत प्रयोग नही करना चाहिए. वीरता के साथ शांतप्रिय होना चाहिए. भगवान् श्री कृष्ण जब चाहते तब अपनी शक्ति प्रयोग करके पांडव का राज्य दिला देते परन्तु उन्होंने कौरव के पास शांति प्रस्ताव भेजा और धर्म और न्याय के अनुसार युद्ध किया.
  4. स्त्री का सम्मान भगवान् श्री कृष्ण के लिए सर्बोपरि था अपनी माया से द्रोपती के सम्मान की रक्षा की.
  5. मनुष्य का जीवन सरल व सहज होना चाहिए. जिस तरह भगवान् श्री कृष्ण शक्ति सम्पन्न होने के बावजूद भी अर्जुन के सारथी बने और युधिष्ठिर के दूत बने. एक बार तो भगवान् श्री कृष्ण ने दुर्योधन के छप्पन व्यंजन को छोड़कर विदुर के धर सादा भोजन करना पसंद किया.
  6. मनुष्य के अंदर क्षमा करने का गुण होना चाहिए. भगवान् श्री कृष्ण ने शिशुपाल के 100 अपराधो को क्षमा किया था और जब अंत में उसके व्यवहार में कोई परिवर्तन नही हुआ तब शिशुपाल का वध किया था.

गीता उपदेश 1 (Geeta Updesh 1)

क्यों व्यर्थ की चिंता करते हो? किससे व्यर्थ डरते हो? कौन तुम्हें मार सकता हैं? आत्मा न पैदा होती हैं और न ही मरती हैं.

गीता उपदेश 2 (Geeta Updesh 2)

जो हुआ, वह अच्छा हुआ. जो हो रहा है, वह भी अच्छा हो रहा है. जो होगा, वह भी अच्छा होगा. तुम भूत का पश्चाताप मत करो. भविष्य की चिंता मत करो. वर्तमान चल रहा हैं.

गीता उपदेश 3 (Geeta Updesh 3)

तुम्हारा क्या गया? जो तुम रोते हो. तुम क्या लाये थे? जो तुमने खो दिया. तुमने क्या पैदा किया था? जो नाश हो गया. न तुम कुछ लेकर आये, जो लिया यही से लिया जो दिया यही पर दिया.

गीता उपदेश 4 (Geeta Updesh 4)

ख़ाली हाथ आए और ख़ाली हाथ चले. जो आज तुम्हारा हैं, कल और किसी का था, परसों किसी और का होगा. तुम इसे अपना समझ क्र मग्न हो रहे हो. बस यही प्रसन्नता तुम्हारे दुःखो का कारण हैं.

गीता उपदेश 5 (Geeta Updesh 5)

परिवर्तन संसार का नियम हैं, जिसे तुम मृत्यु समझते हो, वही तो जीवन हैं. एक क्षण में तुम करोड़ो के स्वामी बन जाते हो, दुसरे ही क्षण दरिद्र हो जाते हो. मेरा-तेरा, छोटा-बड़ा, अपना-पराया, मन से मिटा दो. फिर सब तुम्हारा हैं और तुम सबके हो.

गीता उपदेश 6 (Geeta Updesh 6)

न यह शरीर तुम्हारा हैं, न तुम शरीर के हो. यह अग्नि, जल, वायु, पृथ्वी और आकाश से बना हैं और इसी में मिल जाएगा परन्तु आत्मा स्थिर हैं.

गीता उपदेश 7 (Geeta Updesh 7)

तुम अपने आपको भगवान् को अर्पित कर दो, यही सबसे उत्तम सहारा हैं. जो इस सहारे को जानता हैं वह भय, चिंता और शोक से सर्वदा मुक्त रहता हैं.

गीता उपदेश 8 (Geeta Updesh 8)

कर्म (अच्छे कर्म) करने से, मनुष्य के जीवन में सुख, शान्ति और समृद्ध की वृद्धि होती हैं. अकर्म (बुरे कर्म) करने से, मनुष्य के जीवन में दुःख, रोग, चिंता, भय, संताप, शोक से ग्रसित हो अनेको कष्ट को भोगता हैं.

गीता उपदेश 9 (Geeta Updesh 9)

पत्नी को त्याग कर कोई व्यक्ति सन्यासी नही बन सकता, मनुष्य अपने अंदर के पांच विकार (काम, क्रोध, लोभ, मोह और अहंकार) छोड़कर ही सच्चा सन्यासी बन सकता हैं.

गीता उपदेश 10 (Geeta Updesh 10)

आत्मा अक्षय ज्ञान का स्रोत है. ज्ञान शक्ति की विभिन्न मात्रा से क्रिया शक्ति का उदय होता है, प्रकृति का जन्म होता है. प्रकृति के गुण सत्त्व, रज, तम का जन्म होता है। सत्त्व-रज की अधिकता धर्म को जन्म देती है, तम-रज की अधिकता होने पर आसुरी वृत्तियाँ प्रबल होती हैं.

गीता उपदेश 11 (Geeta Updesh 11)

धर्म एवं अधर्म को समझना आवश्यक है. आत्मा का स्वभाव धर्म है अथवा कहा जाय धर्म ही आत्मा है. आत्मा का स्वभाव है पूर्ण शुद्ध ज्ञान, ज्ञान ही आनन्द और शान्ति का अक्षय धाम है. इसके विपरीत अज्ञान, अशांति, क्लेश और अधर्म का द्योतक है.

गीता उपदेश 12 (Geeta Updesh 12)

धर्म का अर्थ है धारण करने वाला अथवा जिसे धारण किया गया है. धारण करने वाला जो है उसे आत्मा कहा गया है और जिसे धारण किया है वह प्रकृति है. आत्मा इस संसार का बीज अर्थात पिता है और प्रकृति गर्भधारण करने वाली योनि अर्थात माता है.